नई दिल्ली: अक्सर माता-पिता को लगता है कि बच्चा कुछ महीनों बाद खुद ही बैठना, चलना या बोलना सीख जाएगा। हर बच्चे की ग्रोथ अलग होती है, यह बात सही है, लेकिन अगर यह देरी लगातार बनी हुई है तो इसे सिर्फ सामान्य देरी समझकर छोड़ देना ठीक नहीं। कई बार इसके पीछे सेरेब्रल पाल्सी जैसी न्यूरोलॉजिकल स्थिति हो सकती है।
सेरेब्रल पाल्सी कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक ऐसी स्थिति है, जिसमें दिमाग और मांसपेशियों के बीच का तालमेल बिगड़ जाता है। यह तब होता है जब गर्भावस्था के दौरान, जन्म के समय या जन्म के तुरंत बाद बच्चे के दिमाग को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती या किसी कारण से दिमाग के विकास में बाधा आ जाती है। इसका सीधा असर बच्चे की शारीरिक गतिविधियों पर पड़ता है।
सेरेब्रल पाल्सी आखिर है क्या?
हमारा दिमाग ही शरीर की हर हरकत को कंट्रोल करता है। सेरेब्रल पाल्सी में दिमाग के उसी हिस्से पर असर पड़ता है जो मसल्स मूवमेंट और बॉडी बैलेंस को संभालता है। इसीलिए एक बच्चा दूसरे बच्चे से बिल्कुल अलग लक्षण दिखा सकता है। किसी को चलने में लड़खड़ाहट होती है, तो किसी को हाथों से चीजें पकड़ने या साफ बोलने में दिक्कत आती है।
यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है कि सेरेब्रल पाल्सी समय के साथ बढ़ने वाली स्थिति नहीं है, यानी दिमाग की चोट नहीं बढ़ती, लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसके रोजमर्रा के कामों में चुनौतियां नए रूप में सामने आ सकती हैं।
कौन से लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए?
हर बच्चे में लक्षण एक जैसे नहीं होते, लेकिन कुछ सामान्य संकेत ये हैं:
1. मांसपेशियों से जुड़े संकेत: मांसपेशियों में जरूरत से ज्यादा अकड़न या बिल्कुल ढीलापन महसूस होना। बच्चा बार-बार एक तरफ झुक जाना या संतुलन न बना पाना।
2. विकास में देरी: उम्र के हिसाब से बैठने, घुटनों के बल चलने, खड़े होने या चलने में लगातार देरी।
3. खाने और बोलने में दिक्कत: दूध पीते समय अटकना, खाने को चबाने या निगलने में परेशानी, देर से बोलना या बोली का साफ न होना।
4. अन्य संकेत: देखने-सुनने में दिक्कत, किसी एक चीज पर ध्यान केंद्रित न कर पाना।
इनमें से कोई भी एक-दो लक्षण दिखने पर घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन डॉक्टर से एक बार सलाह जरूर लेनी चाहिए।
क्या इसका पूरा इलाज संभव है?
फिलहाल मेडिकल साइंस में ऐसा कोई इलाज नहीं है जो सेरेब्रल पाल्सी को पूरी तरह खत्म कर दे। लेकिन अच्छी खबर यह है कि समय पर पहचान और सही देखभाल से बच्चे की जिंदगी में बहुत बड़ा सुधार लाया जा सकता है। इस स्थिति में डॉक्टर बच्चे की जरूरत के अनुसार फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी और स्पीच थेरेपी की सलाह देते हैं। कुछ मामलों में मांसपेशियों की अकड़न कम करने के लिए दवाएं भी दी जाती हैं।
माता-पिता की भूमिका सबसे अहम
इस सफर में थेरेपी जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है माता-पिता का धैर्य। रोजाना एक्सरसाइज कराना, बच्चे की छोटी-छोटी जीत पर उसे प्रोत्साहित करना और उसे दूसरों पर निर्भर होने के बजाय खुद से कोशिश करने देना, उसके आत्मविश्वास के लिए सबसे बड़ी दवा है। अगर बच्चे के विकास में लगातार देरी दिखाई दे रही है या वह उम्र के मुताबिक बैठने, खड़े होने, चलने या बोलने में सक्षम नहीं हो पा रहा है, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। समय पर पहचान और सही देखभाल से बच्चे को अपनी क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है।
Disclaimer: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी लक्षण के दिखने पर कृपया अपने डॉक्टर से सलाह लें।












