नई दिल्ली: हाल ही में सोशल मीडिया पर एक ऐसा वीडियो सामने आया है, जो अब चर्चा का विषय बन गया है। बता दें, जिस खिलाड़ी ने कभी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन किया था और देश के लिए चार स्वर्ण पदक जीते था। आज वही खिलाड़ी सड़क किनारे सब्जी बेचकर और कैब चलाकर अपने परिवार का खर्च उठा रहा है। यह कहानी झारखंड के रहने वाले 29 वर्षीय थ्रोबॉल खिलाड़ी अमरदीप कुमार है, जिसके बाद खेल व्यवस्था और खिलाड़ियों को मिल रही इज़्ज़त और राशि को लेकर सवाल उठने लगा है।
वीडियो में सब्जी बेचते आए नजर
सोशल मीडिया पर सामने आए में देखा जा सकता है कि अमरदीप रांची के अर्गोड़ा चौक पर सब्जी बेचते दिखाई दे रहे हैं। खास बात यह है कि उनके पीछे दीवार पर उनके जीते हुए पदक भी नजर आ रहे हैं। एक तरफ देश के लिए हासिल की गई उपलब्धियां और दूसरी तरफ रोजमर्रा की आर्थिक चुनौतियां, यह तस्वीर सोशल मीडिया यूजर्स को भावुक कर रही है।
13 साल की उम्र में शुरू किया खेल
अमरदीप ने महज 13 साल की उम्र में थ्रोबॉल खेलना शुरू किया था। उनकी प्रतिभा को देखकर एक स्थानीय खिलाड़ी ने उन्हें रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में मुफ्त ट्रेनिंग दिलाई। इसके बाद उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी। उस समय वह अपने पिता की सब्जी की दुकान पर भी हाथ बंटाते थे और साथ-साथ खेल की तैयारी करते थे।
उनके खेल करियर की बड़ी उपलब्धियों में 2015 में मलेशिया में हुई एशियन जूनियर थ्रोबॉल चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक शामिल है। इसके बाद 2017 में काठमांडू में इंडो-नेपाल थ्रोबॉल चैंपियनशिप, 2019 में बेंगलुरु में साउथ एशियन थ्रोबॉल चैंपियनशिप और 2026 में रांची में आयोजित चैंपियनशिप में भी उन्होंने गोल्ड मेडल जीता था।
पदक मिले, लेकिन आर्थिक सुरक्षा नहीं
अमरदीप के मुताबिक, प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए उन्हें कई बार कर्ज तक लेना पड़ा। इन कर्जों को चुकाने के लिए वह सब्जी बेचने के साथ कैब भी चलाते हैं। उनका परिवार भी आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहा है। पिता सब्जी बेचते हैं, जबकि मां घर संभालने के साथ घर-घर जाकर सब्जी बेचती हैं। उनके बड़े भाई की छोटी दुकान है।
CM सोरेन ने लिया मामले का संज्ञान
वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने सरकार से अमरदीप की मदद करने की मांग की। इसके बाद झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी संज्ञान लिया और खेल विभाग को तत्काल जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए। अमरदीप का कहना है कि उन्होंने सरकारी नौकरी और नकद पुरस्कार के लिए कई बार आवेदन किया, लेकिन अब तक उन्हें कोई ठोस मदद नहीं मिल पाई है। उनकी कहानी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को खेल के बाद आर्थिक सुरक्षा क्यों नहीं मिल पाती।












