नई दिल्ली: पिछले कुछ दिनों में यमन के हूती लड़ाकों ने जिस रफ्तार से लाल सागर के तटीय इलाकों और बॉब-अल-मंदेब स्ट्रेट के नजदीकी द्वीपों पर कब्जा जमाया, उसने बड़े-बड़े रणनीतिक जानकारों को भी हैरत में डाल दिया है। हूती लड़ाकों ने अमेरिका और सऊदी अरब समर्थित यमन की सरकारी सेना से एक के बाद एक तटीय क्षेत्र और द्वीप अपने कब्जे में ले लिए। इतना ही नहीं, इस दौरान हूती ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद समेत उसके चार समुद्र तटीय शहरों को भी निशाना बनाया। इन हमलों में सैन्य ठिकानों, तेल रिफाइनरियों और ऑयल फैसिलिटीज को टारगेट किया गया, वहीं करीब 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन को भी नुकसान पहुंचाया गया।
ईरानी सलाहकारों की भूमिका पर उठे सवाल
जानकारों का मानना है कि हूती लड़ाकों की इस अचानक बढ़ी सैन्य ताकत के पीछे ईरान के सैन्य सलाहकारों का बड़ा हाथ है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC ने हूती को इस कदर प्रशिक्षित किया है कि वे अब किसी भी नियमित सरकारी सेना को टक्कर देने में सक्षम हो गए हैं। सूत्रों के अनुसार सितंबर में जैसे ही इलाके में तनाव बढ़ा, IRGC के अधिकारी खुद सना और हूती के अन्य ठिकानों पर पहुंच गए और वहीं से पूरे ऑपरेशन की कमान संभाली।
महज 48 घंटे में पलटी बाजी
इसी रणनीतिक निर्देशन का नतीजा रहा कि हूती लड़ाकों ने बेहद कम समय यानी सिर्फ 48 घंटों के भीतर लाल सागर के तटीय क्षेत्रों और उसे अरब सागर से जोड़ने वाले अहम बॉब-अल-मंदेब स्ट्रेट के करीबी द्वीपों पर पूरी तरह कब्जा जमा लिया। इस तेज कार्रवाई ने क्षेत्र के सैन्य संतुलन को अचानक बदल दिया है।
ईरान के लिए रणनीतिक बढ़त
इस पूरे घटनाक्रम से ईरान को भी सीधा फायदा मिलता दिख रहा है। क्षेत्र में हूती अब उसके एक मजबूत और सक्षम सहयोगी के तौर पर उभरे हैं। इससे ईरान की स्थिति और मजबूत हो गई है, क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट के बाद अब वह बॉब-अल-मंदेब के रास्ते होने वाले तेल निर्यात को भी बाधित करने की क्षमता रखता है। गौरतलब है कि अमेरिका की सैन्य कार्रवाई तेज होने की स्थिति में ईरान पहले ही इस तरह की धमकी दे चुका है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर खतरा मंडरा सकता है।












