नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में सर्दियों के दौरान बढ़ते वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए बीएस-4 वाहनों पर प्रतिबंध की नीति ने परिवहन क्षेत्र में नई बहस छेड़ दी है। दिल्ली सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की मौसमी पाबंदियों पर सवाल उठाते हुए दिल्ली सरकार के पूर्व उप परिवहन आयुक्त अनिल छिकारा ने इसे तकनीकी तथ्यों कानूनी प्रावधानों और जमीनी परिस्थितियों के नजरिये से दोबारा परखने की मांग की है। उनका तर्क है कि प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई जरूरी है, लेकिन कार्रवाई का आधार वाहन की वास्तविक प्रदूषण स्थिति और तकनीकी फिटनेस होनी चाहिए, केवल उसके उत्सर्जन मानक या निर्माण वर्ष को नहीं।
प्रयोगशाला के आंकड़े बनाम दिल्ली की सड़कें
अनिल छिकारा के मुताबिक प्रयोगशाला में अधिक भार और विशेष परिस्थितियों में किए गए उत्सर्जन परीक्षणों के परिणामों को दिल्ली की वास्तविक यातायात परिस्थितियों पर सीधे लागू करना उचित नहीं है। राजधानी में जाम, कम गति और बार-बार रुकने-चलने की स्थिति रहती है। उनका दावा है कि अच्छी तरह रखरखाव किए गए बीएस-4 वाहनों के वास्तविक उत्सर्जन की जांच किए बिना उन्हें प्रदूषण का प्रमुख जिम्मेदार मानना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है। हालांकि, बीएस-4 और बीएस-6 वाहनों के उत्सर्जन मानकों में अंतर है और वास्तविक प्रदूषण वाहन की तकनीक, रखरखाव तथा परिचालन परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
अदालत के आदेश और नियमों पर सवाल
पूर्व अधिकारी ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय में पुराने वाहनों से संबंधित मामलों का हवाला देते हुए कहा कि वाहन संबंधी प्रतिबंधों की कानूनी व्याख्या स्पष्ट होनी चाहिए। उनका कहना है कि बीएस-4 वाहनों के मामले में भी केंद्र के मोटर वाहन नियमों, पंजीकरण व्यवस्था और न्यायिक निर्देशों के बीच तालमेल जरूरी है। उनके अनुसार, दिल्ली में पुनः पंजीकरण पर लगी पाबंदियों और दूसरे राज्यों में लागू व्यवस्थाओं के अंतर से वाहन मालिकों को असमान परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।
दोपहिया वाहनों को छूट, चारपहिया पर शिकंजा?
छिकारा ने नीति के चयनात्मक स्वरूप पर भी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि यदि लक्ष्य वाहन प्रदूषण घटाना है, तो सभी श्रेणियों के वाहनों के वास्तविक उत्सर्जन का निष्पक्ष आकलन होना चाहिए। केवल चुनिंदा वाहनों पर प्रतिबंध लगाने के बजाय सड़क पर धुआं छोड़ने वाले वाहनों की प्रभावी जांच और निगरानी व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए।
पांच साल की मोहलत की मांग
पूर्व उप परिवहन आयुक्त ने सुझाव दिया है कि बीएस-4 वाहनों को अधिकृत स्वचालित परीक्षण केंद्रों पर कठोर प्रदूषण और तकनीकी फिटनेस जांच में सफल होने की शर्त पर पांच वर्ष की अतिरिक्त परिचालन अवधि दी जाए। उनका मानना है कि इससे पर्यावरण संरक्षण और वाहन मालिकों के आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
उन्होंने यह आशंका भी जताई कि ऐसी नीतियों के पीछे कुछ कारोबारी हितों का दबाव हो सकता है, हालांकि इसके समर्थन में कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है। इस पहलू की स्वतंत्र जांच के बिना इसे तथ्य नहीं माना जा सकता।
सवाल यही है प्रदूषण पर प्रहार जरूरी है, लेकिन क्या हर बीएस-4 वाहन को एक ही तराजू में तौलना सही है? दिल्ली को ऐसी नीति चाहिए जिसमें पर्यावरण की रक्षा भी हो और नियमों का पालन करने वाले वाहन मालिकों के साथ न्याय भी।












