नई दिल्ली: पाकिस्तान में प्रांतों की सीमाएं बदलने और नए प्रांत बनाने की चर्चा तेज हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर बड़े प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने के पक्ष में हैं। इस योजना के तहत देश में 12 से 15 नए प्रांत बनाने का विकल्प सामने आया है। हालांकि, इस प्रस्ताव से राजनीतिक समीकरण बदलने की आशंका भी जताई जा रही है। फिलहाल पाकिस्तान में पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान चार प्रमुख प्रांत हैं। आबादी और क्षेत्रफल के मामले में इनके बीच काफी अंतर है। पंजाब सबसे अधिक आबादी वाला प्रांत है, जहां करीब 12.8 करोड़ लोग रहते हैं। वहीं, बलूचिस्तान क्षेत्रफल में सबसे बड़ा है, लेकिन इसकी आबादी करीब डेढ़ करोड़ है।
बड़े प्रांतों का प्रशासन संभालना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। ग्रामीण इलाकों में लोगों को सरकारी सेवाओं के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में छोटे प्रांत बनाने के समर्थकों का तर्क है कि इससे प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर हो सकती है।
सत्ता के समीकरण बदलने की आशंका
इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज है। पंजाब को पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N), जबकि सिंध को पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का मजबूत गढ़ माना जाता है। इन प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने से दोनों दलों का क्षेत्रीय प्रभाव प्रभावित हो सकता है।
आलोचकों को आशंका है कि नए प्रांत केंद्र सरकार पर अधिक निर्भर हो सकते हैं। इससे इस्लामाबाद का प्रभाव बढ़ सकता है। पाकिस्तान की राजनीति में सेना की लंबे समय से अहम भूमिका रही है, इसलिए इस योजना के संभावित राजनीतिक असर पर भी सवाल उठ रहे हैं।
160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनाने की चर्चा
पाकिस्तान में प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की मांग पहले भी उठ चुकी है। योजना मंत्री अहसान इकबाल छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों और अधिक प्रांतों की जरूरत पर बात कर चुके हैं। रिपोर्ट्स में 12 से 15 प्रांतों के साथ 160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनाने का विकल्प भी सामने आया है। हालांकि, इसे लेकर अंतिम फैसला स्पष्ट नहीं है।
बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में चुनौतियां
बलूचिस्तान लंबे समय से अलगाववादी हिंसा और संसाधनों पर अधिकार को लेकर विवादों का सामना कर रहा है। वहीं, खैबर पख्तूनख्वा में केंद्र और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के बीच तनाव की खबरें आती रही हैं। ऐसे में प्रांतों का पुनर्गठन स्थानीय पहचान, राजनीतिक अधिकारों और सत्ता के बंटवारे से जुड़े सवाल खड़े कर सकता है। फिलहाल, पाकिस्तान का नक्शा बदलने की यह चर्चा प्रस्ताव के स्तर पर है। इसे अंतिम निर्णय मानना जल्दबाजी होगी।












