10 दिन की मोहलत, 100% टैरिफ का डर! ट्रंप भारत से क्या मनवाना चाहते हैं?

0
10

भारत के लिए आने वाले दिन व्यापारिक मोर्चे पर अहम साबित हो सकते हैं। नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने संकेत दिया कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर प्रतिबंधों से जुड़े प्रस्ताव को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करीब दस दिनों में फैसला कर सकते हैं। उनके बयान के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का विकल्प वास्तव में इस्तेमाल किया जाएगा।

हालांकि, राजदूत ने यह नहीं कहा कि भारत पर ऐसा शुल्क लगाने का अंतिम निर्णय हो चुका है। उन्होंने बताया कि इस विषय पर दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और प्रस्तावित व्यवस्था अलग-अलग श्रेणियों में बांटी गई है। भारत का नाम जिन देशों के संदर्भ में चर्चा में है, उससे व्यापार जगत की चिंता बढ़ सकती है। लेकिन जब तक अमेरिकी प्रशासन औपचारिक आदेश जारी नहीं करता, तब तक किसी संभावित दर या उसके लागू होने की तारीख को अंतिम मानना जल्दबाजी होगी।

रूस का तेल बना अमेरिका और भारत के बीच दबाव का मुद्दा

इस विवाद की पृष्ठभूमि रूस-यूक्रेन युद्ध और रूस की ऊर्जा आय से जुड़ी है। अमेरिका चाहता है कि रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़े, ताकि मॉस्को की युद्ध जारी रखने की आर्थिक क्षमता प्रभावित हो। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है और कीमत, उपलब्धता तथा आपूर्ति की स्थिरता को ध्यान में रखकर तेल खरीदता है। रूस से मिलने वाली प्रतिस्पर्धी कीमतें भारतीय खरीदारों के लिए महत्वपूर्ण रही हैं। ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों का दायरा बढ़ने पर भारत के सामने ऊर्जा लागत और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती आ सकती है।

क्या 100 प्रतिशत टैरिफ वास्तव में लग सकता है?

अमेरिका में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर कड़े शुल्क लगाने की व्यवस्था को लेकर चर्चा जारी है। ऐसी व्यवस्था लागू होने पर प्रभावित देशों के सामान पर भारी आयात शुल्क लगाया जा सकता है। हालांकि, सर्जियो गोर के बयान को भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की पुष्टि नहीं समझना चाहिए। अंतिम निर्णय राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी प्रशासन की औपचारिक घोषणा पर निर्भर करेगा। प्रस्ताव का वास्तविक दायरा, संभावित छूट और लागू होने की शर्तें भी महत्वपूर्ण होंगी।

भारतीय कारोबारियों पर क्या पड़ सकता है असर?

यदि भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी शुल्क बढ़ता है, तो अमेरिका में आयातकों की लागत बढ़ सकती है। वे इस अतिरिक्त खर्च को खुद वहन कर सकते हैं, ग्राहकों से अधिक कीमत ले सकते हैं या भारतीय आपूर्तिकर्ताओं से दाम घटाने की मांग कर सकते हैं। ऐसे हालात में कपड़ा, चमड़ा, आभूषण, कालीन और समुद्री उत्पाद जैसे निर्यात क्षेत्रों को प्रतिस्पर्धा में कठिनाई हो सकती है। हालांकि, वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-से उत्पाद शुल्क के दायरे में आते हैं और अमेरिकी खरीदार किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं।

दोनों देशों के पास बातचीत का विकल्प

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक मुद्दों पर बातचीत जारी है। इसलिए आने वाले दिनों में तीन संभावनाएं सामने रह सकती हैं-अमेरिका सख्त शुल्क लागू करे, कुछ श्रेणियों में सीमित कार्रवाई करे या बातचीत के जरिए समाधान तलाशे। फिलहाल किसी एक नतीजे को तय मानना उचित नहीं है। भारतीय सरकार के लिए ऊर्जा सुरक्षा और निर्यात हित महत्वपूर्ण रहेंगे, जबकि वॉशिंगटन रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति को आगे बढ़ाना चाहता है।

अगले दस दिनों पर क्यों टिकी हैं निगाहें?

सर्जियो गोर के बयान ने संभावित फैसले की समयसीमा को चर्चा में ला दिया है, लेकिन यह समयसीमा अपने आप में अंतिम आदेश नहीं है। व्यापार जगत और नीति-निर्माताओं की निगाह अब अमेरिकी प्रशासन की आधिकारिक घोषणा पर रहेगी। भारत पर शुल्क लागू होगा या नहीं, किस दर से होगा और किन वस्तुओं पर असर पड़ेगा—इन सवालों का जवाब औपचारिक फैसले के बाद ही मिलेगा। तब तक 100 प्रतिशत टैरिफ की आशंका को संभावना के रूप में देखना चाहिए, तय हो चुके निर्णय के रूप में नहीं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here