मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर उठे सवाल, आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में रखा अपना पक्ष

0
9

भारतीय चुनाव आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज को लेकर दायर याचिका के जवाब में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखा है। आयोग ने अपने जवाबी हलफनामे में दावा किया कि याचिका की बुनियाद एक समाचार रिपोर्ट है और उसमें उठाए गए सवालों को तथ्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए। आयोग के अनुसार, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से संबंधित अहम आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से जारी किए गए थे।

हलफनामे में जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 में जारी आदेशों का उल्लेख करते हुए निर्णय लेने की प्रक्रिया, मतदाता पंजीकरण और फॉर्म-6 से जुड़े विवादों पर स्पष्टीकरण दिया गया है। आयोग ने यह भी बताया कि फाइलों पर दर्ज टिप्पणियों और अंतिम निर्णय के बीच अंतर समझना जरूरी है।

तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से फैसले लेने का दावा

चुनाव आयोग ने उस आरोप को खारिज किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अकेले ही महत्वपूर्ण फैसले लेते हैं। हलफनामे के अनुसार, जवाबी दस्तावेज को मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों ने मिलकर मंजूरी दी है।

आयोग ने बताया कि किसी प्रस्ताव पर निर्णय लेने से पहले संबंधित अधिकारियों और चुनाव आयुक्तों के विचार, सवाल तथा सुझाव देखे जाते हैं। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत फैसला लिया जाता है। आयोग के मुताबिक, फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त के पास, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त के पास और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष भेजी जाती है। जरूरत पड़ने पर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी स्वीकृति ली जा सकती है। निर्णय को रिकॉर्ड में दर्ज करने के बाद संबंधित आदेश जारी किया जाता है।

आयोग ने स्पष्ट किया कि फाइल पर लिखी गई कोई टिप्पणी, सवाल या सुझाव अपने आप में संस्थागत फैसला नहीं बन जाता। आधिकारिक निर्णय वही माना जाएगा, जो निर्धारित प्रक्रिया और अधिकारों के अनुरूप लिया गया हो।

आंतरिक कार्य-विभाजन से जुड़े विवाद पर सफाई

हलफनामे में जुलाई 2026 के दौरान आयोग के आंतरिक कामकाज के बंटवारे से जुड़े घटनाक्रम का भी उल्लेख किया गया है। आयोग के अनुसार, 28 जुलाई को प्रतिनियुक्ति पर तैनात एक अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारी ने कार्य-विभाजन से संबंधित आदेश जारी किया था।

इसके अगले दिन दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस आदेश और संबंधित अधिकारी के आचरण को लेकर कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे। आयोग का कहना है कि 30 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से संयुक्त निर्देश जारी होने के बाद 28 जुलाई वाला आदेश लागू नहीं किया गया। आयोग ने इस घटनाक्रम के आधार पर लगाए गए आरोपों को गलतफहमी से जुड़ा बताया है।

फॉर्म-6 में बदलाव की बात पर आयोग का स्पष्टीकरण

नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 को लेकर आयोग ने कहा कि उसमें कोई संशोधन नहीं किया गया है। आयोग के अनुसार, इस फॉर्म में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। उसने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म-6 और घोषणा-पत्र जिस तरह प्रदर्शित हो रहे थे, उससे बदलाव होने का भ्रम पैदा हो सकता था।

आयोग ने बताया कि 21 अक्टूबर से ऑनलाइन आवेदन को दो अलग-अलग हिस्सों में दिखाने की व्यवस्था की गई है। इनमें एक फॉर्म-6 और दूसरा घोषणा-पत्र है। घोषणा-पत्र में ऐसी जानकारी देने की सुविधा भी शामिल की गई, जिससे आवेदक अपनी या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी की 2002–2003 की पुरानी मतदाता सूची में दर्ज विवरण साझा कर सकें। आयोग का कहना है कि इससे अतिरिक्त दस्तावेज जुटाने की जरूरत कम हो सकती है।

मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया

आयोग ने अपने जवाब में कहा कि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी ईआरओ के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम सूची में शामिल नहीं किया जा सकता और न ही हटाया जा सकता है। जिन लोगों का विवरण पुरानी मतदाता सूची से मेल नहीं खाता, उनके मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच और स्पष्टीकरण का अवसर देने की बात कही गई है।

आयोग के अनुसार, ऐसे मतदाताओं को हर मामले में सुनवाई के लिए कार्यालय बुलाना जरूरी नहीं है। बूथ स्तर के अधिकारी यानी बीएलओ उनके घर जाकर आवश्यक दस्तावेज एकत्र कर सकते हैं। सुनवाई की जरूरत विशेष परिस्थितियों में ही पड़ेगी। आयोग ने यह भी बताया कि मतदाता सूची से संबंधित नियमों के पालन की जांच के लिए आईआईटी और आईआईएससी के विशेषज्ञों की समिति बनाई गई है।

गोवा के 97 मतदाताओं के मामलों पर भी जानकारी

हलफनामे में गोवा के 97 मतदाताओं से जुड़े मामलों का भी उल्लेख है, जिनके नाम सूची से छूटने की बात सामने आई थी। आयोग के अनुसार, इनमें से 88 लोग पहले से ही मतदाता सूची में दर्ज थे, छह विदेश में थे और तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे।

आयोग ने यह भी कहा कि उसने अपनी कोई आंतरिक फाइल या नोट मीडिया को जारी नहीं किया और न ही ऐसा करने की अनुमति दी। दशहरा अवकाश के कारण संक्षिप्त जवाब दाखिल करने की बात कहते हुए आयोग ने विस्तृत और बिंदुवार जवाब प्रस्तुत करने की अनुमति भी मांगी है।

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया पर आयोग का तर्क

चुनाव आयोग ने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है। इसी आधार पर आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त को काम करने से रोकने की मांग वाली याचिका की सुनवाई योग्य होने पर सवाल उठाए हैं।

यह आयोग की ओर से अदालत में पेश किया गया तर्क है, न कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला। इस बीच महाराष्ट्र में एसआईआर को चुनौती देने वाली एक अलग याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, उस मामले में अगली सुनवाई 5 नवंबर को निर्धारित है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here