नई दिल्ली: नेपाल और तिब्बत की सीमा पर आई भीषण जलप्रलय ने पूरे इलाके को तहस-नहस कर दिया है। सैलाब के उग्र रूप ने तिब्बत के प्रमुख व्यापारिक केंद्र ग्यिरोंग पोर्ट को भारी नुकसान पहुंचाया, जहाँ तेज बहाव में सड़कें, इमारतें और बुनियादी ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह गए। जान बचाने के लिए बेबस होकर भागते लोगों के खौफनाक मंजर प्रत्यक्षदर्शियों के कैमरों में कैद हो गए, जिन्हें वैश्विक मीडिया पर प्रमुखता से दिखाया जा रहा है। हालाँकि, इस विनाशकारी त्रासदी का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि जिस देश में यह आपदा आई है, वहीं की आम जनता इस तबाही की वास्तविक भयावहता से अनजान रखी जा रही है।
मलबे में जिंदगियों की तलाश
बड़ी संख्या में लोग मलबे में दबे और लापता बताए जा रहे हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आपातकालीन समीक्षा बैठक बुलाई।
जिसके बाद प्रधानमंत्री को स्थिति का जायजा लेने प्रभावित क्षेत्रों में भेजा गया। सैकड़ों राहत कर्मियों की टीमें तेज बहाव और भूस्खलन की चुनौतियों के बीच घायलों को निकालने और बचाव कार्यों में जुटी हुई हैं।
सेंसरशिप का शिकंजा
वैश्विक मंचों पर आपदा के विनाशकारी दृश्य साफ दिख रहे हैं, लेकिन चीन के भीतर इन वीडियो पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया गया है। सरकारी मीडिया केवल राहत सामग्री वितरण और नियंत्रित बचाव अभियानों का ही चयनात्मक फुटेज दिखा रहा है। स्थानीय सोशल मीडिया पर पीड़ितों द्वारा साझा की जा रही तस्वीरों, लापता लोगों की जानकारियों और स्वतंत्र पोस्ट को तुरंत हटाया जा रहा है, ताकि असंतोष न पनपे।
तिब्बत की राजनीतिक संवेदनशीलता
विशेषज्ञों का मानना है कि इस सख्त मीडिया प्रतिबंध की जड़ें तिब्बत के संवेदनशील इतिहास से जुड़ी हैं। वर्ष 1950 के दशक से तिब्बत पर कड़ा नियंत्रण रखने वाली कम्युनिस्ट पार्टी विदेशी पत्रकारों की स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर पूरी तरह रोक लगाती आई है। आपदा के फौरन बाद स्थानीय पार्टी कार्यालय ने सदस्यों को राहत के साथ-साथ ‘सामाजिक व्यवस्था और जनविश्वास’ बनाए रखने का कड़ा निर्देश जारी किया है। खौफ के इस माहौल में पीड़ित परिवार अपना दर्द साझा करने से भी डर रहे हैं, जिसके चलते वास्तविक मौतों और नुकसान का सही आंकड़ा सरकारी सेंसरशिप की दिवार के पीछे पूरी तरह छिप गया है।












