नई दिल्ली: क्या भारत के पड़ोस में इस्लामिक NATO जैसा सैन्य गठबंधन बन रहा है? इस सवाल ने दिल्ली की टेंशन बढ़ा दी है। बांग्लादेश के दो जूनियर मंत्रियों ने कहा है कि ढाका पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच बने तीन देशों वाले डिफेंस पैक्ट में शामिल होने के लिए तैयार है। भारत इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रहा है क्योंकि यह सीधे तौर पर क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा है।
बांग्लादेश ने क्या कहा? बांग्लादेश फर्स्ट नीति का दिया हवाला
इस हफ्ते सरकारी न्यूज एजेंसी बांग्लादेश संगबाद संस्था BSS से बात करते हुए विदेश मामलों के नए राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार बांग्लादेश फर्स्ट नीति पर चल रही है, जिसमें राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर हैं।
उन्होंने संकेत दिया कि PM तारिक रहमान जल्द ही रियाद में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मिल सकते हैं, जिससे साफ है कि ढाका इस पैक्ट में दिलचस्पी रखता है।
PTI के मुताबिक उन्होंने कहा, बांग्लादेश अपने हितों और ग्लोबल इकॉनमी-ट्रेड में हो रहे बदलावों को देखते हुए सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के साथ किसी इकोनॉमिक या डिफेंस फ्रेमवर्क में शामिल होने को लेकर पॉजिटिव है।
उनकी बात का समर्थन विदेश मामलों की एक और राज्य मंत्री शामा ओबैद इस्लाम ने भी किया। शुक्रवार को मीडिया से उन्होंने कहा, हम किसी पैक्ट या मल्टीलेटरल संस्था में शामिल होंगे या नहीं, यह इस बात पर तय होगा कि बांग्लादेश और बांग्लादेशी लोगों के हितों की रक्षा होती है या नहीं।
क्या है सऊदी-पाक-तुर्की डिफेंस पैक्ट, क्यों कहा जा रहा इस्लामिक NATO?
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच यह पैक्ट मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट के नाम से जाना जाता है और इसे 7 अगस्त को मक्का में साइन किया गया था। यह समझौता NATO की तरह है, जिसमें तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने पर उसे सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा।
इस पैक्ट में मिस्र ने भी शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसका स्वागत किया है और कहा है कि इससे पता चलता है कि देश आखिरकार सही तरीके से अपनी रक्षा की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
भारत के लिए क्यों है चिंता, किसके खिलाफ है ये गठबंधन
क्षेत्रीय जानकारों का कहना है कि इस पैक्ट का मकसद ईरान और मिडिल ईस्ट में उसके असर को रोकना है। हालांकि तीनों सदस्यों का कहना है कि यह समझौता किसी देश के खिलाफ नहीं, सिर्फ संप्रभुता की रक्षा के लिए है। ईरान ने कहा है कि इससे सऊदी अरब की सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलेगी।
संयुक्त बयान में कहा गया, इस समझौते का मकसद किसी भी हमले के खिलाफ सामूहिक सुरक्षा मजबूत करना है। इसमें तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के सभी पहलुओं को बेहतर बनाने की व्यवस्था है।












