नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण का कहर एक बार फिर लोगों की सांसों पर भारी पड़ रहा है। हवा में जहर घुल रहा है, सांसों की कीमत बढ़ रही है और अस्पतालों में मरीजों की कतारें लंबी होती जा रही हैं। लेकिन हैरानी देखिए उससे निपटने की जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं दिखता। यहां प्रदूषण किसी के पद और प्रतिष्ठा में भेदभाव नहीं करता। सबके फेफड़ों में वही जहरीली हवा पहुंच रही है, मगर कार्रवाई के नाम पर व्यवस्था की रफ्तार बेहद धीमी है। वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में वीआईपी के लिए कोई अलग रास्ता नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि जब खतरा सबके सामने है तो समाधान की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
पर्यावरणविद् ओंकार तिवारी ने दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण पर गंभीर सवाल उठाते हुए बताया कि समस्या संसाधनों और तकनीक की कमी से ज्यादा सरकारी तंत्र की निर्णयहीनता में छिपी है। उनके मुताबिक हर साल सर्दियां आते ही प्रदूषण बढ़ता है, अस्पतालों में सांस संबंधी मरीजों की संख्या बढ़ती है, लेकिन सरकारी कार्रवाई फाइलों, बैठकों और निविदाओं के चक्रव्यूह में उलझकर रह जाती है।
छह साल से फाइलों में कैद धुएं का हिसाब
तिवारी के अनुसार, दिल्ली के प्रदूषण में वाहनों की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत बताई जाती है। सबसे ज्यादा धुआं छोड़ने वाले वाहनों की पहचान के लिए रिमोट सेंसिंग डिवाइस जैसी तकनीक उपलब्ध है। सड़क किनारे लगा यह उपकरण चलते वाहन के उत्सर्जन की जांच कर सकता है और अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियों की पहचान कर सकता है। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भी निगरानी व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 26 अक्टूबर 2020 को एआईएस-170 मानक का मसौदा जारी किया था। लेकिन नवंबर 2026 तक इसे अंतिम रूप से अधिसूचित नहीं किए जाने का सवाल उठ रहा है। नतीजा यह है कि तकनीक मौजूद होने के बावजूद उसे व्यापक स्तर पर लागू करने की प्रक्रिया अटकी हुई है।
44 करोड़ के स्मॉग टावर, लेकिन हवा में राहत कहां?
दिल्ली में वर्ष 2021 में लगभग 22-22 करोड़ रुपये की लागत से दो स्मॉग टावर लगाए गए थे। एक कनॉट प्लेस में दिल्ली सरकार और दूसरा आनंद विहार में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से स्थापित किया गया। ओंकार तिवारी का सवाल है कि जब इन मशीनों पर करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं तो इनका प्रभावी इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा? उनके मुताबिक, कनॉट प्लेस का स्मॉग टावर बंद पड़ा है, जबकि आनंद विहार वाले टावर के रखरखाव पर हर महीने लगभग 11 से 12 लाख रुपये खर्च होने की बात सामने आई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सूचना अधिकार संबंधी जवाब में सीमित दायरे में प्रदूषण कम करने का दावा किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि तकनीक आंशिक राहत भी दे सकती है तो उसका नियमित संचालन क्यों नहीं सुनिश्चित किया जा रहा?
104 करोड़ का टेंडर, मगर सर्दी ने पहले ही दे दी दस्तक
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने 17 सितंबर 2026 को 40 स्थानों पर नई प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों के पायलट परीक्षण के लिए 104 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया। छह अक्टूबर को खुलने वाली निविदा की तारीख संशोधन के बाद 11 नवंबर कर दी गई। यानी जिस सर्दी से निपटने के लिए योजना बनाई गई, वह सर्दी दस्तक दे चुकी है और जमीन पर परिणाम का इंतजार जारी है।तिवारी का कहना है कि प्रदूषण जैसी आपात स्थिति को सामान्य सरकारी खरीद प्रक्रिया के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। नई तकनीकों को सीमित अवधि के पायलट प्रोजेक्ट के रूप में मौका देना चाहिए और उनके परिणामों की पारदर्शी समीक्षा होनी चाहिए।
अब भाषण नहीं, फैसलों की जरूरत
ओंकार तिवारी के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर के लगभग चार करोड़ नागरिकों के स्वास्थ्य, बच्चों के फेफड़ों, अस्पतालों के खर्च और कामकाज पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए तत्काल निर्णय लेना जरूरी है। सरकार को वाहनों के धुएं, निर्माण की धूल, सड़क के मलबे, खुले में कचरा जलाने और अन्य प्रदूषण स्रोतों पर प्रभावी कार्रवाई करनी होगी।।उन्होंने अपील की कि आम नागरिक भी कूड़ा और अन्य अपशिष्ट न जलाएं, निर्माण सामग्री को खुले में न छोड़ें और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के इस्तेमाल से बचें। वहीं अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि लंबित मानकों, टेंडरों और बंद पड़ी मशीनों पर तत्काल निर्णय लें। सवाल सिर्फ साफ हवा का नहीं, आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी का है। अगर आज भी जिम्मेदार लोग फैसले लेने से बचते रहे तो आने वाले समय में प्रदूषण पर होने वाली बहसें सरकारी सभागारों में नहीं, अस्पतालों के गलियारों में होंगी। हवा सबकी है, इसलिए इसे बचाने की जिम्मेदारी भी सबकी है।












