नई दिल्ली: देश के चुनावी तंत्र की सबसे अहम संस्था चुनाव आयोग के भीतर ही मतभेद की खबरों ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर आयोग के तीन सदस्यों के बीच असहमति की रिपोर्ट सामने आते ही सवालों का सिलसिला शुरू हो गया, और अब खुद चुनाव आयोग को इस पर सफाई देनी पड़ी है।
ECI से जुड़े सूत्रों का कहना है कि किसी भी मुद्दे पर विचार-विमर्श के दौरान चुनाव आयुक्तों का सवाल पूछना, स्पष्टीकरण मांगना या अपनी राय जाहिर करना पूरी तरह सामान्य बात है, और इसे औपचारिक असहमति यानी डिसेंट नहीं समझा जाना चाहिए। सूत्रों के मुताबिक SIR से संबंधित कई मुद्दों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने टिप्पणियां जरूर कीं और फैसला लेने से पहले उन पर गौर भी किया गया, लेकिन किसी ने भी अंतिम निर्णय के खिलाफ विधिवत रूप से अपना विरोध दर्ज नहीं कराया। आयोग यह भी बता रहा है कि जिन आदेशों को विवाद का केंद्र बताया जा रहा है, उन सभी पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर मौजूद हैं।
चुनाव आयोग के अनुसार, बैठक के दौरान किसी आयुक्त का सवाल खड़ा करना या अपनी राय व्यक्त करना कामकाज की सामान्य प्रक्रिया का ही हिस्सा है। तीन सदस्यीय आयोग की संरचना में हर आयुक्त की भूमिका बराबर मानी जाती है, और अगर किसी बिंदु पर सहमति नहीं बनती, तो बहुमत की राय के आधार पर आगे का रास्ता तय होता है। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने बीते 10 महीनों के भीतर SIR से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों आयुक्तों ने कुछ कदमों को बिना उनकी सहमति के उठाए जाने पर भी सवाल खड़े किए थे।
क्या पहले भी दर्ज हुआ है ऐसा मतभेद
चुनाव आयोग के इतिहास में यह पहला मौका नहीं है जब किसी सदस्य ने बहुमत से अलग रुख अपनाया हो। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों से जुड़ी आचार संहिता की कुछ शिकायतों पर अपने साथी सदस्यों से भिन्न राय रखी थी। इससे भी पहले, साल 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सोनिया गांधी की कथित अयोग्यता वाले मामले में चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और नवीन चावला से अलग स्टैंड लिया था। इन दोनों घटनाओं में आयोग के भीतर असहमति दर्ज करने की व्यवस्था का औपचारिक रूप से इस्तेमाल हुआ था।
जब सिर्फ एक ही सदस्य संभालता था आयोग
आज भले ही चुनाव आयोग तीन सदस्यों की व्यवस्था के तहत काम करता हो, लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था। 1950 में जब आयोग का गठन हुआ, तब यह केवल मुख्य चुनाव आयुक्त वाला एकल सदस्यीय निकाय था, और यह व्यवस्था 1989 तक जारी रही। 1989 में पहली बार दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति हुई, लेकिन यह प्रयोग ज्यादा दिन नहीं चला और 1990 में आयोग फिर से एक सदस्यीय हो गया। आखिरकार 1993 में दो अतिरिक्त आयुक्तों की स्थायी नियुक्ति के साथ तीन सदस्यीय ढांचा हमेशा के लिए स्थापित हो गया।
मौजूदा विवाद की जड़ में यही सवाल है कि आयुक्तों की आंतरिक टिप्पणियों को किस नजरिए से देखा जाए। जहां ECI सूत्र इन्हें सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा बता रहे हैं, वहीं प्रकाशित रिपोर्ट इन्हें रिकॉर्ड पर दर्ज बाकायदा आपत्तियों के तौर पर पेश कर रही है। आयोग ने किसी भी तरह के केंद्रीय हस्तक्षेप के आरोपों को सिरे से खारिज किया है और कहा है कि पूरे देश में एक ही सिस्टम काम करता है, जिसमें सभी ईआरओ डेटा फीड करते हैं और अब तक किसी ने इस पर शिकायत नहीं की है। सूत्रों का यह भी मानना है कि पिछले 14 महीनों में सैकड़ों बार शुरुआती मतभेद के बावजूद अंततः सर्वसम्मति से फैसले लिए गए।
विपक्ष ने उठाए तीखे सवाल
इस पूरे मामले पर विपक्ष ने आक्रामक रुख अपनाया है। टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर बार-बार आपत्ति जताई है, तो राज्यसभा में लंबित प्रस्ताव को अब आगे बढ़ाया जाना चाहिए, साथ ही उन्होंने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग भी उठाई। इसके अलावा सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने भी आयोग के कामकाज पर सवाल खड़े किए। सिब्बल का आरोप है कि दोनों आयुक्तों ने फॉर्म-6 में बदलाव और वोटर लिस्ट से जुड़े निर्णयों पर आपत्ति दर्ज कराई थी। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी, जयराम रमेश, आप नेता सौरभ भारद्वाज और शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत सहित कई अन्य नेताओं ने भी इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए आयोग की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा किया।












