नई दिल्ली: कैंसर.. एक ऐसी बीमारी, जिसका नाम सुनते ही परिवारों के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं। लेकिन इस जानलेवा बीमारी का सबसे खतरनाक पहलू केवल इसकी गंभीरता नहीं, बल्कि इसके शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करना भी है। मुंह में ऐसा छाला जो चार सप्ताह बाद भी ठीक न हो, स्तन में महसूस होने वाली गांठ, बिना किसी स्पष्ट कारण के लगातार वजन घटना या शरीर में होने वाले असामान्य बदलाव ये लक्षण किसी बड़ी बीमारी की दस्तक हो सकते हैं। अफसोस की बात है कि कई लोग इन्हें मामूली परेशानी समझकर महीनों तक टालते रहते हैं। जब तक अस्पताल पहुंचते हैं, तब तक बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है।
इसी चुनौती के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए हर वर्ष 7 नवंबर को राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2014 में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने इस दिवस की शुरुआत की थी। यह दिन वैज्ञानिक मैरी क्यूरी की जयंती से भी जुड़ा है, जिनके रेडियोधर्मिता संबंधी शोध ने विकिरण चिकित्सा के विकास की नींव मजबूत की। इस दिवस का उद्देश्य कैंसर की रोकथाम, शुरुआती पहचान और समय पर उपचार के प्रति समाज को जागरूक करना है।
हर साल 15.6 लाख नए मामले, देर से अस्पताल पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल कैंसर के लगभग 15.6 लाख नए मामले सामने आते हैं। पुरुषों में मुंह, फेफड़े और प्रोस्टेट का कैंसर प्रमुख रूप से पाया जाता है, जबकि महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। वैश्विक कैंसर आंकड़ों के अनुसार महिलाओं में होने वाले कुल कैंसर मामलों में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी स्तन कैंसर की है। इसके बाद गर्भाशय ग्रीवा, मुंह और अंडाशय के कैंसर के मामले सामने आते हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि भारत में लगभग 70 से 80 प्रतिशत मरीज बीमारी की उन्नत अवस्था में अस्पताल पहुंचते हैं। इसका सीधा असर इलाज की सफलता और मरीज के जीवन पर पड़ता है। आर्थिक मजबूरियां, जानकारी का अभाव, कामकाज का नुकसान, अस्पतालों तक पहुंचने में परेशानी और शुरुआती लक्षणों की अनदेखी इस संकट को और गंभीर बना देती है।
सरकारी योजनाओं से राहत, लेकिन इलाज की राह अभी भी मुश्किल
कैंसर के महंगे इलाज को आम लोगों की पहुंच में लाने के लिए आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत पात्र परिवारों को प्रतिवर्ष पांच लाख रुपये तक का कैशलेस अस्पताल उपचार उपलब्ध कराया जाता है। इसमें निर्धारित कैंसर उपचार भी शामिल हैं। जन औषधि और अमृत दवा केंद्रों के माध्यम से कैंसर की महंगी दवाओं को कम कीमत पर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में 17 कैंसर दवाओं को सीमा शुल्क से छूट दी गई है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण द्वारा 543 कैंसर दवा ब्रांडों की अधिकतम खुदरा कीमतों में संशोधन भी 9 नवंबर से प्रभावी होना है। सरकारी अनुमानों के अनुसार इससे मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। इसके अलावा आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से मुंह, स्तन और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की व्यापक जांच का अभियान चलाया जा रहा है। फरवरी 2026 तक मुंह के कैंसर की 34.7 करोड़, स्तन कैंसर की 16.2 करोड़ और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की 8.7 करोड़ जांच दर्ज की गई थीं। फरवरी 2026 में शुरू किया गया 14 वर्ष की किशोरियों के लिए एचपीवी टीकाकरण अभियान भी बचाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
जांच के बाद इलाज तक पहुंचे मरीज, तभी सफल होगी मुहिम
विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि जांच में संदिग्ध लक्षण मिलने के बाद मरीज का निदान और उपचार भी समय पर हो। केवल जांच करा देना पर्याप्त नहीं है। मरीज को सही विशेषज्ञ तक पहुंचाना, बीमारी की पुष्टि करना, किफायती उपचार उपलब्ध कराना और इलाज के बाद नियमित निगरानी करना भी उतना ही जरूरी है। कई छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में कैंसर विशेषज्ञों की कमी है। रेडियोथेरेपी मशीनों की उपलब्धता भी जरूरत के मुकाबले कम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानक प्रति दस लाख आबादी पर एक रेडियोथेरेपी मशीन का है, जबकि भारत में यह अनुपात लगभग 0.6 है। कई जगह उपकरण होने के बावजूद प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी के कारण उनका पूरा उपयोग नहीं हो पाता। कैंसर के आंकड़ों और मरीजों की निगरानी के लिए भी देश में एक मजबूत और व्यापक व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है।
डॉक्टरों की दोटूक: चार सप्ताह से पुराना छाला और स्तन में गांठ को न करें नजरअंदाज
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई अस्पताल पहुंचने के बाद नहीं, बल्कि बीमारी के शुरुआती संकेतों को पहचानने से शुरू होती है। वर्धमान महावीर चिकित्सा महाविद्यालय एवं सफदरजंग अस्पताल के शल्य कैंसर चिकित्सा विभाग की चिकित्सा अधिकारी डॉ. सौम्या अग्रवाल ने जागरूकता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि लोगों को कैंसर के लक्षणों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में पहचानना सीखना होगा।
डॉ. सौम्या अग्रवाल के अनुसार
मुंह में कोई छाला चार सप्ताह से अधिक समय तक बना रहता है या स्तन में किसी प्रकार की गांठ महसूस होती है तो तत्काल चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। ऐसे लक्षणों को सामान्य परेशानी मानकर लंबे समय तक टालना खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि स्कूलों के बच्चों को भी कैंसर जागरूकता अभियान से जोड़ना जरूरी है। इसके लिए स्कूली पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य और कैंसर से बचाव संबंधी जानकारी को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि बच्चे छोटी उम्र से ही जागरूक बनें और अपने परिवार तथा समाज को भी जागरूक कर सकें।
कैंसर इलाज का हो विकेंद्रीकरण, जिला स्तर पर मिलें आधुनिक सुविधाएं
वहीं वर्धमान महावीर चिकित्सा महाविद्यालय एवं सफदरजंग अस्पताल के शल्य कैंसर चिकित्सा विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार का मानना है कि कैंसर के उपचार को केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित रखने के बजाय जिला स्तर तक मजबूत बनाना होगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में शुरुआती पहचान, जांच, विशेषज्ञों से परामर्श और उपचार की सुविधाएं बढ़ाना जरूरी है। मरीज को उपचार के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा न करनी पड़े, इसके लिए चिकित्सा सुविधाओं का विकेंद्रीकरण समय की मांग है। डॉ. राकेश कुमार के अनुसार, कैंसर के उपचार में शुरुआती पहचान के साथ प्रशिक्षित चिकित्सकों, आधुनिक जांच सुविधाओं, रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी की उपलब्धता भी अहम भूमिका निभाती है। मरीज को बीमारी की पुष्टि से लेकर उपचार पूरा होने और नियमित निगरानी तक एक व्यवस्थित चिकित्सा सहायता मिलनी चाहिए।
सस्ती दवाएं और सरकारी योजनाएं जरूरी, इलाज के आर्थिक बोझ से मिले राहत
केंद्रीय सरकारी स्वास्थ्य योजना, उत्तर क्षेत्र के अतिरिक्त निदेशक कार्यालय में तैनात चिकित्सा अधिकारी डॉ. रोहित जोशी ने भी कैंसर के खिलाफ लड़ाई में जागरूकता, सस्ती दवाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता को महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक कैंसर केवल मरीज की बीमारी नहीं रह जाता, बल्कि पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से प्रभावित करता है। कई परिवार इलाज के खर्च के कारण कर्ज लेने या अपनी संपत्ति तक बेचने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में सरकारी योजनाओं के लाभ को जरूरतमंद मरीजों तक प्रभावी तरीके से पहुंचाना और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है।
स्कूलों से लेकर अस्पतालों तक चले जागरूकता की मुहिम
विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर के लगभग चार में से एक से अधिक नहीं बल्कि करीब चार में से एक से दो मामलों के बजाय लगभग 40 प्रतिशत मामलों में ऐसे जोखिम कारक शामिल होते हैं, जिनसे बचाव संभव है। तंबाकू का सेवन, अस्वस्थ जीवनशैली और एचपीवी संक्रमण जैसे कारकों पर नियंत्रण करके कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है। इसके लिए स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम, तंबाकू विरोधी अभियान, नियमित स्वास्थ्य जांच और किशोरियों के लिए एचपीवी टीकाकरण को बढ़ावा देना जरूरी है। साथ ही जिला अस्पतालों में जांच और उपचार की सुविधाएं बढ़ाई जानी चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीक और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों का उपयोग भी विशेषज्ञों की कमी को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है।
सिर्फ एक दिन नहीं, हर दिन हो कैंसर के खिलाफ जंग
राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस का संदेश स्पष्ट है। कैंसर से लड़ाई केवल महंगे अस्पतालों, बड़ी मशीनों और दवाओं से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए जागरूक नागरिक, प्रशिक्षित चिकित्सक, मजबूत सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था, सस्ती दवाएं और समय पर उपचार की पूरी श्रृंखला जरूरी है। डॉ. सौम्या अग्रवाल, डॉ. राकेश कुमार और डॉ. रोहित जोशी का संदेश भी यही है कि बीमारी के शुरुआती संकेतों को पहचानें, जांच कराने में देरी न करें और जागरूकता को घर-घर तक पहुंचाएं। क्योंकि कैंसर के खिलाफ सबसे बड़ी जीत वही है, जिसमें बीमारी को मरीज की जिंदगी पर हावी होने का मौका ही न मिले।












