नई दिल्ली: सनातन परंपरा में हमारे पूर्वजों यानी पितरों का स्थान बेहद पवित्र और पूजनीय माना गया है। पितृ पक्ष यानी श्राद्ध महालय का यह समय अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति सम्मान और श्रद्धा जताने का बेहद खास अवसर होता है। मान्यता है कि इस दौरान हमारे पितर सूक्ष्म रूप में धरती पर आते हैं, और परिजनों द्वारा किए गए तर्पण व दान-पुण्य से तृप्त होकर परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
सामान्य नियम के अनुसार, पूर्वज का जिस तिथि पर स्वर्गवास हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है। हालांकि पितृ पक्ष के दौरान तीन ऐसी विशेष तिथियां भी आती हैं, जिनका अपना गहरा आध्यात्मिक महत्व है।
महाभरणी श्राद्ध का महत्व
भरणी नक्षत्र से जुड़े होने के कारण इसे महाभरणी श्राद्ध कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, अगर परिवार में किसी सदस्य की असमय मृत्यु हुई हो या वे अविवाहित रहे हों, तो इस दिन उनका श्राद्ध करना खास फलदायी माना जाता है। साथ ही किसी परिजन के निधन का एक साल पूरा होने पर भी इस तिथि का महत्व और बढ़ जाता है। वर्ष 2026 में महाभरणी श्राद्ध 29 सितंबर यानी मंगलवार को पड़ रहा है।
मातृ नवमी: महिला पूर्वजों को समर्पित दिन
पितृ पक्ष की नवमी तिथि पूरी तरह घर-परिवार की दिवंगत महिला पूर्वजों जैसे माता, दादी, नानी, बहन या सास की स्मृति को समर्पित होती है। इसे मातृ श्राद्ध भी कहा जाता है। अगर किसी कारणवश परिवार की किसी महिला सदस्य के निधन की सही तिथि याद न हो, तो मातृ नवमी के दिन उनके नाम से तर्पण, दान और कन्या भोजन कराना सबसे उचित माना जाता है। इस साल मातृ नवमी 4 अक्टूबर यानी रविवार को मनाई जाएगी।
सर्वपितृ अमावस्या: पितृ पक्ष का अंतिम और सबसे अहम दिन
पितृ पक्ष का आखिरी दिन सर्वपितृ अमावस्या कहलाता है, जिसे महालय अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। यह पूरे पितृ पक्ष का सबसे प्रमुख दिन माना जाता है। अगर आपको अपने किसी पूर्वज के निधन की सही तिथि नहीं पता, या किसी वजह से आप उनकी तय तिथि पर श्राद्ध नहीं कर पाए, तो इस दिन सभी पितरों का एक साथ तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए दान से सभी पूर्वज प्रसन्न होकर अपने लोक लौटते हैं। इस साल सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर यानी शनिवार को पड़ेगी।
क्या सिर्फ इन तीन दिनों में ही करना चाहिए श्राद्ध?
हिंदू शास्त्रों के मुताबिक, व्यक्ति का जिस तिथि पर निधन हुआ हो, पितृ पक्ष की उसी तिथि पर उनका तर्पण करना ही प्राथमिक नियम माना जाता है। जैसे अगर किसी का निधन द्वितीया या अष्टमी तिथि को हुआ है, तो उनका श्राद्ध उसी तिथि पर करना चाहिए। ऊपर बताई गई तीन तिथियों का महत्व इसलिए ज्यादा है, क्योंकि ये खास परिस्थितियों जैसे तिथि याद न होने, महिलाओं के विशेष श्राद्ध या अविवाहितों के श्राद्ध के लिए एक आसान और धार्मिक रास्ता उपलब्ध कराती हैं।
वर्ष 2026 में पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर को, प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर को और द्वितीया श्राद्ध 28 सितंबर को पड़ेगा। इसके बाद तृतीया और महाभरणी श्राद्ध 29 सितंबर को, चतुर्थी व पंचमी श्राद्ध 30 सितंबर को मनाए जाएंगे। षष्ठी श्राद्ध 1 अक्टूबर, सप्तमी श्राद्ध 2 अक्टूबर और अष्टमी श्राद्ध 3 अक्टूबर को होगा। नवमी यानी मातृ नवमी श्राद्ध 4 अक्टूबर को, दशमी श्राद्ध 5 अक्टूबर को और एकादशी श्राद्ध 6 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इसके बाद द्वादशी व मघा श्राद्ध 7 अक्टूबर, त्रयोदशी श्राद्ध 8 अक्टूबर और चतुर्दशी श्राद्ध 9 अक्टूबर को पड़ेगा। अंत में सर्वपितृ अमावस्या के साथ 10 अक्टूबर को पूरा पितृ पक्ष संपन्न होगा।












