नई दिल्ली: भाद्रपद मास की कृष्णाष्टमी को पूरे देश में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन केवल बाल-गोपाल के जन्मोत्सव की खुशियां मनाने का अवसर ही नहीं है, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की अलौकिक लीलाओं, उनके गूढ़ संदेशों और अगाध प्रेम को पुनः स्मरण करने का एक पवित्र दिन भी है। श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन केवल महाभारत के धर्मयुद्ध या श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके जीवन में अनेक ऐसी रहस्यमयी और मर्मस्पर्शी पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं जो आज भी लोगों को रोमांचित कर देती हैं। आइए जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण के जीवन के उन चार अनसुने पहलुओं के बारे में जो प्रेम, कर्तव्य और समर्पण की अनूठी मिसाल पेश करते हैं।
कंस से बचाव के लिए यशोदा मैया का अनोखा रूप
बचपन में मां द्वारा लड़कों को कन्या के वस्त्र पहनाकर सजाने की परंपरा आज भी कई भारतीय परिवारों में देखी जाती है। जन्म के पश्चात जब कान्हा गोकुल में माता यशोदा के पास पहुंचे, तो कंस ने उन्हें मारने के लिए पूतना, बकासुर और त्रिणावर्त जैसे कई भयानक राक्षसों को भेजा।
अपने लल्ला को इन नकारात्मक शक्तियों और कंस के गुप्तचरों की नजरों से बचाने के लिए माता यशोदा कभी-कभी कान्हा को कन्या के रूप में सजा देती थीं। राक्षसों को धोखा देने और बच्चे की जान बचाने की यही परंपरा कालांतर में एक लोकमान्यता बन गई, जिसे आज भी बुरी नजर से रक्षा के प्रतीक के रूप में माना जाता है।
कान्हा के जीवन के अद्भुत रहस्य
हर कोई जानता है कि कान्हा माखनचोर थे और अपने ग्वाल-बालों के साथ माखन बांटकर खाते थे। किंतु अनेक कथाओं में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि वे बंदरों को बड़े प्रेम से माखन खिलाया करते थे। इसके मूल में अवतारों का गहरा संबंध छिपा हुआ है।
श्रीकृष्ण को अपने पूर्व अवतार भगवान श्रीराम का स्मरण था। त्रेता युग में जब माता सीता की खोज और रावण से युद्ध का समय आया, तब वानर सेना ने अपना सर्वस्व अर्पण कर श्री राम की सहायता की थी। उसी कृतज्ञता और प्रेम को चुकाने के लिए द्वापर युग में श्रीकृष्ण वानरों के प्रति विशेष स्नेह रखते थे और उन्हें प्रेमपूर्वक माखन खिलाते थे।
गुरुदक्षिणा के लिए समुद्र की गहराइयों में उतरे कान्हा
यमुना में कालिया नाग का मर्दन करने की कथा तो विख्यात है, लेकिन श्रीकृष्ण का समुद्र की अतल गहराइयों में उतरने का एक और अद्भुत प्रसंग महर्षि सांदीपनि के आश्रम से जुड़ा है। उज्जैन में अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम ने गुरु सांदीपनि से गुरुदक्षिणा मांगने का आग्रह किया, तब महर्षि ने समुद्र में लापता हो चुके अपने पुत्र को वापस लाने की इच्छा जताई। अपने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर श्रीकृष्ण समुद्र की गहराई में पहुंचे, जहां उनका सामना पंचजन नामक दैत्य से हुआ। उस असुर का संहार कर और यमलोक तक जाकर श्रीकृष्ण ने अपने गुरुपुत्र को सकुशल वापस लाकर गुरुदक्षिणा की सर्वोत्कृष्ट परंपरा स्थापित की।
राधा रानी के चरणों की धूल
एक बार श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर भारी आयोजन के बीच प्रभु सिरदर्द का बहाना बनाकर विश्राम करने लगे। माता रुक्मिणी और सत्यभामा के पूछने पर उन्होंने कहा कि यदि कोई परम भक्त अपने चरणों की धूल उनके मस्तक पर लगा दे, तो उनका यह पीड़ा शांत हो सकती है। रुक्मिणी, सत्यभामा और देवर्षि नारद तक पाप लगने के भय से पीछे हट गए, क्योंकि ईश्वर के सिर पर पैर की धूल रखना महापाप माना जाता था। जब यह संदेश वृंदावन में राधा रानी तक पहुंचा, तो उन्होंने बिना एक क्षण गंवाए अपने चरणों की धूल दे दी। राधा ने कहा कि चाहे उन्हें अनंत काल तक नरक की यातनाएं क्यों न झेलनी पड़ें, उनके प्रिय कान्हा का कष्ट दूर होना ही सर्वोपरि है। यही निष्काम और निःस्वार्थ प्रेम श्रीकृष्ण के जीवन का सबसे बड़ा सत्य रहा।












