इस्लामाबाद: पाकिस्तान के प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक नेता मौलाना फजलुर रहमान ने ऐसे बयान दिए हैं, जिनसे पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में हलचल मच गई है. उन्होंने दावा किया कि बलूचिस्तान का बड़ा हिस्सा अब सरकार के प्रभावी नियंत्रण से बाहर है. साथ ही सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को राजनीति से दूरी बनाने की सलाह देते हुए कहा कि यदि उन्हें राजनीति में इतनी दिलचस्पी है तो वर्दी उतारकर चुनाव मैदान में उतरना चाहिए.
जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फज़ल) यानी JUI-F के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सेना प्रमुख आसिम मुनीर पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि सेना का काम देश की सुरक्षा करना है, न कि राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करना. उनके अनुसार, अगर सेना प्रमुख जनता का समर्थन देखना चाहते हैं तो उन्हें संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए चुनाव लड़ना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ा फैसला करती है और किसी भी संस्था को संविधान की तय सीमाओं के भीतर रहकर काम करना चाहिए.
‘बलूचिस्तान में सरकार की पकड़ कमजोर’
फजलुर रहमान ने दावा किया कि बलूचिस्तान के कई इलाकों में पाकिस्तान सरकार का प्रभाव काफी कमजोर हो चुका है. उनके अनुसार, वहां लंबे समय से हिंसा और अस्थिरता बनी हुई है, लेकिन हालात सुधारने में सरकार सफल नहीं रही. उन्होंने कहा कि क्षेत्र में बढ़ती अशांति के कारण आम लोगों का भरोसा सरकारी व्यवस्था से कम हुआ है. उनके मुताबिक, सुरक्षा के नाम पर उठाए गए कुछ कदमों ने स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ाई है, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों तक देखने को मिल सकता है.समय और कैलेंडर.
खैबर पख्तूनख्वा की स्थिति पर भी जताई चिंता
बलूचिस्तान के साथ-साथ उन्होंने खैबर पख्तूनख्वा का भी जिक्र किया. उनका कहना था कि वहां भी लगातार हिंसक घटनाएं हो रही हैं और हालात चिंताजनक बने हुए हैं. उन्होंने दावा किया कि हाल के दिनों में कई लोगों की मौत हुई है, जिससे इलाके में भय और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है. फजलुर रहमान ने कहा कि सरकार को केवल सैन्य कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय राजनीतिक संवाद और भरोसा बहाल करने की दिशा में भी कदम उठाने चाहिए.
‘सेना की रणनीति से बढ़ सकती है नाराजगी’
JUI-F प्रमुख ने आरोप लगाया कि मौजूदा रणनीति से स्थानीय लोगों और सुरक्षा बलों के बीच दूरी बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि यदि समस्याओं का समाधान बातचीत और राजनीतिक प्रक्रिया के जरिए नहीं निकाला गया, तो इसका असर लंबे समय तक बना रह सकता है. उनका कहना था कि किसी भी संघर्ष का स्थायी समाधान केवल बल प्रयोग नहीं हो सकता. लोगों का विश्वास जीतना और विकास के जरिए हालात सामान्य करना ज्यादा जरूरी है.
नागरिकों को हथियार उठाने की अपील का किया विरोध
हाल ही में सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने नागरिकों से आतंकवाद और विद्रोह के खिलाफ सहयोग करने की अपील की थी. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए फजलुर रहमान ने कहा कि आम नागरिकों को किसी भी सैन्य संघर्ष का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी सुरक्षा एजेंसियों और सेना की होती है. यदि किसी व्यक्ति से युद्ध जैसी जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा की जाती है, तो उसके लिए उचित प्रशिक्षण, संसाधन और व्यवस्था भी होनी चाहिए.
राजनीतिक बयान से बढ़ी बहस
मौलाना फजलुर रहमान के इन बयानों के बाद पाकिस्तान में सेना की भूमिका, बलूचिस्तान की सुरक्षा स्थिति और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर नई बहस शुरू हो गई है. हालांकि, उनके दावों पर सरकार या सेना की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. विशेषज्ञों का मानना है कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा और राजनीतिक चुनौतियां लंबे समय से बनी हुई हैं. ऐसे में इस तरह के बयान आने वाले दिनों में पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति और सुरक्षा संबंधी चर्चाओं को और तेज कर सकते हैं.










