नई दिल्ली: लोकतंत्र की ताकत एक जैसे नियमों में नहीं, बल्कि विविधता का सम्मान करते हुए मजबूत व्यवस्था बनाने में है। दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने विधायी संस्थाओं के कामकाज में सुधार का आह्वान करते हुए कहा कि समान नियमों का अर्थ हर विधानसभा पर एक जैसे नियम थोपना नहीं होना चाहिए। दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी की संवैधानिक विशिष्टताओं को ध्यान में रखकर ही आदर्श नियम बनाए जाने चाहिए। भारत में विधायी निकायों के कामकाज और प्रक्रिया में एकरूपता लाने के लिए आयोजित समिति की बैठक में गुप्ता ने महिला सम्मान के अनुरूप नियमों में लैंगिक तटस्थ भाषा अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के नियमों में भी नारी शक्ति की बढ़ती भूमिका दिखाई देनी चाहिए।
साल में कम से कम 30 बैठकों और डिजिटल नोटिस का सुझाव
उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना की अध्यक्षता में हुई बैठक में गुप्ता ने सभी राज्यों की विधानसभाओं के लिए साल में कम से कम 30 बैठकें आयोजित करने और बजट मानसून तथा शीतकालीन सत्रों की व्यवस्था को मजबूत बनाने का सुझाव दिया। उन्होंने विधायी कार्यवाही में डिजिटल नोटिस, इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज और ऑनलाइन याचिकाओं को औपचारिक मान्यता देने की वकालत की। उन्होंने विधेयकों की गहन जांच, वित्तीय एवं कानूनी विवरण उपलब्ध कराने तथा जरूरत पड़ने पर उन्हें चयन समितियों के पास भेजने पर भी जोर दिया। साथ ही, विधानसभा अध्यक्षों को प्रक्रियागत मामलों में उचित अधिकार देने की बात कही।
पेपरलेस बैठक से 18,252 पन्नों और पर्यावरण की बड़ी बचत
बैठक की खास उपलब्धि इसका पूरी तरह कागजरहित आयोजन रहा। दिल्ली विधानसभा सचिवालय के आकलन के अनुसार, डिजिटल व्यवस्था से 18,252 पन्नों की बचत हुई। इससे लगभग 4.4 पेड़ों के बराबर कागज, 18,252 लीटर पानी और करीब 182.5 किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन की बचत का अनुमान है।गुप्ता ने स्पष्ट किया कि सुधारों का लक्ष्य केवल नियमों में समानता नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और जनहित को मजबूत करना होना चाहिए।
Reported By: Pankaj Rai












