रंगनाथ मंदिर के गरुड़ स्तंभ का होगा स्वर्ण मंडन, 60 दिन चलेगा पुनरोद्धार कार्य

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वृंदावन: उत्तर भारत के प्रमुख श्री वैष्णव दिव्यदेश श्री रंगनाथ मंदिर में स्थापित गरुड़ ध्वज स्तंभ के पुनरोद्धार की वैदिक प्रक्रिया रविवार को दक्षिण भारतीय विद्वानों के सान्निध्य में संपन्न हो गई। तीन दिवसीय बालालय अनुष्ठान के समापन के बाद अब करीब 50 फीट ऊंचे गरुड़ स्तंभ के स्वर्ण मंडन की तैयारी शुरू होगी। करीब सात किलो सोने से स्तंभ पर दोबारा स्वर्ण आवरण चढ़ाया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में दो महीने से अधिक का समय लगने की संभावना है।

श्री रंगनाथ मंदिर में गरुड़ स्तंभ के पुनरोद्धार की वैदिक प्रक्रिया पूरी

ब्रजवासी रंगनाथ मंदिर को सोने के खंभे वाले मंदिर के नाम से भी जानते हैं। रामानुज संप्रदाय की दिव्यदेश परंपरा में गरुड़ ध्वज स्तंभ का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि भगवान के दर्शन और उनकी शरणागति की पहली सीढ़ी गरुड़ स्तंभ है। करीब पौने दो सौ वर्ष पुराने मंदिर में भगवान श्री गोदा रंगमन्नार के मुख्य गर्भगृह के सामने स्थापित यह स्तंभ शाल और सागवान की लकड़ी से निर्मित है। इसके बाहरी हिस्से पर स्वर्ण आवरण चढ़ा हुआ है। खुले स्थान पर स्थापित होने के कारण समय के साथ इसके कुछ हिस्सों में क्षरण होने लगा था। मंदिर के महंत गोवर्धन पीठाधीश्वर बालक स्वामी की इच्छा के अनुरूप इसके पुनरोद्धार का संकल्प लिया गया है।

तीन दिवसीय बालालय अनुष्ठान पूजा-अर्चना और हवन के साथ संपन्न

पुनरोद्धार की प्रक्रिया को संप्रदाय की वैदिक परंपराओं के अनुसार संपन्न कराने के लिए दक्षिण भारत से आए वेदपाठी विद्वानों के आचार्यत्व में तीन दिवसीय बालालय अनुष्ठान आयोजित किया गया। अनुष्ठान के प्रथम दिन अंकुरारोपण, मृदा रोपण, देव आह्वान, गरुड़ शांति और सुदर्शन हवन सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। दूसरे दिन लघु ब्रह्मोत्सव का आयोजन किया गया। वहीं तीसरे और अंतिम दिन रविवार को शुभ मुहूर्त में विशेष पूजा-अर्चना, हवन और पूर्णाहुति के साथ अनुष्ठान का समापन हुआ। इस दौरान शास्त्रोक्त विधि से गरुड़ स्तंभ की संपूर्ण शक्ति को प्रतीकात्मक स्वरूप में प्रतिस्थापित किया गया, जिसे बालालयम कहा जाता है।

दक्षिण भारत के 10 कारीगर करेंगे गरुड़ स्तंभ का पुनरोद्धार

दक्षिण भारत से आए लक्ष्मी नरसिम्हन के नेतृत्व में दस अनुभवी कारीगर गरुड़ स्तंभ के पुनरोद्धार का कार्य करेंगे। लक्ष्मी नरसिम्हन ने बताया कि वह दक्षिण भारत के कई प्रमुख मंदिरों में इस तरह का कार्य कर चुके हैं। सबसे पहले स्तंभ के चारों ओर पाड़ बांधी जाएगी। इसके बाद लकड़ी की वर्तमान स्थिति और उसकी मजबूती का परीक्षण किया जाएगा। जांच के बाद ही स्वर्ण मंडन की प्रक्रिया शुरू होगी। इसमें 60 दिन से अधिक का समय लग सकता है। मंदिर की सीईओ अनघा श्रीनिवासन ने बताया कि पूरे कार्य में दो महीने से अधिक का समय लगेगा। स्तंभ पर करीब सात किलो सोने का स्वर्ण आवरण चढ़ाया जाएगा। इसके लिए श्रद्धालु भी मंदिर में स्वर्ण दान कर सकेंगे। पुनरोद्धार का कार्य होली के बाद आयोजित होने वाले मंदिर के ब्रह्मोत्सव तक पूरा होने की संभावना है। मंदिर के पुजारी राजू स्वामी ने बताया कि गरुड़ स्तंभ का पुनरोद्धार पहली बार कराया जा रहा है। इस दौरान पुरोहित विजय मिश्र, रघुनाथ स्वामी, रंगा स्वामी, चौवी स्वामी, वासु स्वामी, आर. कृष्णन, एमएल पांडे, शेषाचारी, राजन स्वामी, राजू सक्सेना, सुधा कुलश्रेष्ठ, कल्पना, सुधा कृष्णन, तिरुपति राव और शरद शर्मा सहित अनेक श्रद्धालु मौजूद रहे।

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