अमेरिकी राजनीति में आए ताजा बदलाव का असर अब हजारों किलोमीटर दूर अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर दिखाई देने लगा है। मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने और डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थिति मजबूत होने के बाद वैश्विक कच्चे तेल बाजार में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों ने बदलते राजनीतिक हालात को देखते हुए ऊर्जा क्षेत्र में अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना शुरू कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि कारोबार के दौरान तेल के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मानकों की कीमतों में लगभग दस प्रतिशत तक कमी आ गई। इस घटनाक्रम ने दुनिया भर के बाजारों में नई चर्चा शुरू कर दी है।
अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय तेल दोनों हुए सस्ते
चुनावी परिणामों के बाद अमेरिकी बाजार में कारोबार किए जाने वाले वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत में भारी कमजोरी देखने को मिली। इसका भाव लगभग दस प्रतिशत गिरकर 87.68 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। दूसरी ओर वैश्विक बाजार में प्रमुख मानक माने जाने वाले ब्रेंट क्रूड में भी तेज गिरावट दर्ज की गई। इसकी कीमत में 9.20 प्रतिशत से अधिक की कमी आई और भाव 94.08 डॉलर के स्तर से फिसलकर लगभग 93.40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। इतनी बड़ी गिरावट ने ऊर्जा कारोबार से जुड़े निवेशकों और उत्पादक देशों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
ईरान के साथ बातचीत की संभावना बनी अहम वजह
तेल बाजार में आई इस कमजोरी के पीछे केवल अमेरिकी चुनावी नतीजे जिम्मेदार नहीं माने जा रहे। पश्चिम एशिया की कूटनीतिक परिस्थितियों को लेकर बदलती उम्मीदों ने भी कीमतों को प्रभावित किया है। बाजार के जानकारों के अनुसार, अमेरिकी संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी की मजबूत स्थिति से वाशिंगटन की विदेश नीति में कुछ बदलाव आने की संभावना पर चर्चा शुरू हुई है। निवेशकों को उम्मीद है कि नई राजनीतिक परिस्थितियों में ईरान के साथ बातचीत की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। यदि दोनों पक्षों के बीच तनाव कम होता है और प्रतिबंधों को लेकर कोई सहमति बनती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईरान से तेल की उपलब्धता बढ़ सकती है।
आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद से निवेशकों ने बदली रणनीति
पश्चिम एशिया में तनाव के कारण लंबे समय से तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। इस क्षेत्र में किसी भी बड़े टकराव का असर समुद्री परिवहन और ऊर्जा की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही पर पड़ सकता है। निवेशक इसी जोखिम को ध्यान में रखकर तेल की कीमतों का आकलन करते हैं। अब यदि कूटनीतिक रास्ता खुलता है तो बाजार में अतिरिक्त तेल पहुंचने की संभावना पैदा हो सकती है। आपूर्ति में संभावित बढ़ोतरी की उम्मीद ने कारोबारियों को कीमतों में आगे तेजी की आशंका से दूरी बनाने के लिए प्रेरित किया है।
शेयर बाजारों को मिल सकती है राहत
कच्चे तेल के दाम घटने का फायदा केवल ऊर्जा कारोबार तक सीमित नहीं रहता। जिन देशों को अपनी जरूरतों के लिए विदेशों से पेट्रोलियम खरीदना पड़ता है, उनके आयात बिल पर भी इसका असर पड़ सकता है। ईंधन सस्ता होने से परिवहन, उत्पादन और माल ढुलाई की लागत घटने की संभावना बनती है। इससे महंगाई पर दबाव कम हो सकता है और कंपनियों के खर्च में राहत मिल सकती है। यही वजह है कि तेल की कीमतों में गिरावट को वैश्विक शेयर बाजारों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
आगे की दिशा अमेरिकी फैसलों पर निर्भर
हालांकि मौजूदा गिरावट को स्थायी बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। पश्चिम एशिया में तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और ईरान के साथ किसी संभावित समझौते की तस्वीर भी अभी स्पष्ट नहीं है। आने वाले समय में अमेरिकी प्रशासन की नीतियां, अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक प्रयास और तेल उत्पादक देशों के फैसले बाजार की अगली दिशा तय करेंगे। फिलहाल चुनावी परिणामों ने ऊर्जा कारोबार में अनिश्चितता के साथ नई उम्मीदों का माहौल पैदा कर दिया है।












