नई दिल्ली: हर साल कार्तिक महीने में धनतेरस का त्योहार आता है, इस साल ये 6 नवंबर को है। इस दिन धन के देवता कुबेर की पूजा की जाती है। कुबेर को देवताओं के खजाने का मालिक कहा जाता है। लेकिन एक बात बहुत कम लोग जानते हैं कि कुबेर का वाहन एक इंसान यानी नर है, जबकि बाकी देवताओं का वाहन कोई जानवर या पक्षी होता है।
शास्त्रों में कुबेर के वाहन का कारण
पद्म पुराण और लिंग पुराण के अनुसार भगवान कुबेर को धन-संपत्ति और ऐश्वर्य का अधिपति माना गया है और उनका वाहन नर है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि धन का सबसे वास्तविक उपयोग मनुष्य ही करता है। देवता और राक्षस कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, लेकिन धन का महत्व और नियंत्रण मानव जीवन में ही सबसे ज्यादा है। पृथ्वी पर मनुष्य ही धन कमाता है, उसे जोड़ता है और अपनी जरूरतों के हिसाब से खर्च करता है, इसलिए मानव को ही कुबेर का वाहन माना गया है।
धन के पीछे दौड़ने का जीवन संदेश
इसके पीछे एक और गहरा जीवन संदेश भी है। इंसान अपनी पूरी जिंदगी धन कमाने में लगा देता है, परिवार पालता है और फिर महत्वाकांक्षी होकर और ज्यादा धन की दौड़ में लग जाता है। उसकी जरूरतें और ख्वाहिशें बढ़ती जाती हैं। कई बार पैसे की ये भूख ही इंसान को अपना गुलाम बना लेती है। भगवान कुबेर का नर वाहन यही संकेत देता है कि जो धन के पीछे ज्यादा दौड़ेगा, वो आखिर में धन का ही गुलाम बन जाएगा। अगर आपने धन की जरूरत को नियंत्रित नहीं किया तो धन आपको नियंत्रित कर लेगा। इसलिए सिर्फ धन कमाना और जोड़ना ही जरूरी नहीं है, बल्कि उसके उपयोग और जरूरत पर नियंत्रण रखना भी उतना ही जरूरी है।
लोक कथा: शिव द्वारा वाहन का चयन
लोक परंपरा में इससे जुड़ी एक कथा भी है। कहा जाता है कि जब भगवान शिव ने कुबेर को यक्षों का राजा और धन का अधिपति बनाया तो उनके वाहन को लेकर विचार हुआ। तब ये तय किया गया कि धन का सबसे ज्यादा उपयोग पृथ्वी पर मनुष्य ही करता है, इसलिए नर को ही कुबेर का सबसे उपयुक्त वाहन माना गया।












