‘बच्चों की सुरक्षा के नाम पर इंटरनेट छीनना गलत’, मौलिक अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने का मौलिक अधिकार है और उम्र के आधार पर उन पर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और इंटरनेट की आजादी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि सुरक्षा के ऐसे उपाय होने चाहिए जो उनके अधिकारों को छीने बिना उन्हें सुरक्षित रखें।

उम्र पर बैन से बढ़ेगा खतरा: कोर्ट

यह टिप्पणी केंद्र सरकार द्वारा 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंटरनेट इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए आईटी नियमों में बदलाव की योजना बताने के दो हफ्ते बाद आई है। इससे पहले कोर्ट ने केंद्र से पूछा था कि क्या नाबालिगों को पैरेंट्स की सहमति के बिना सोशल मीडिया अकाउंट बनाने से रोका जाना चाहिए। आंध्र प्रदेश सरकार भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन की योजना पर विचार कर रही है।

कोर्ट ने चेतावनी दी कि उम्र के आधार पर प्रतिबंध लगाने से बच्चे और खतरनाक व अनियंत्रित वेबसाइटों की ओर जा सकते हैं। साथ ही, ऑनलाइन ठगी या धमकी का शिकार होने पर वे सजा के डर से अपने माता-पिता या किसी भरोसेमंद व्यक्ति को इसकी जानकारी नहीं देंगे।

बाल यौन शोषण सामग्री पर सख्ती

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा गाइडलाइंस के बावजूद इंटरनेट पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के लगातार फैलने पर गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने नियामक संस्थाओं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को फटकार लगाते हुए कहा कि वे पीड़ितों की सुरक्षा के लिए गंभीर कदम उठाने में नाकाम रहे हैं।अदालत के सामने रिपोर्ट रखी गई थी कि कई प्लेटफॉर्म्स पर रीडायरेक्ट लिंक और वेबसाइट्स के जरिए इस तरह की सामग्री का पेड प्रमोशन भी हो रहा है। कोर्ट ने कहा कि अभी शिकायत के बाद ही सामग्री हटती है और एक प्लेटफॉर्म पर हटने के बाद भी वह दूसरे प्लेटफॉर्म पर बनी रहती है, जिससे इसे हटाने में देरी होती है।

राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का निर्देश

इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह हैश और यूआरएल का एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करे, ताकि सभी प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी सामग्री की पहचान कर उसे तेजी से हटाया जा सके। कोर्ट ने कहा कि इस सिस्टम में गलत सामग्री हटने से बचाने के लिए वेरिफिकेशन और शिकायत निवारण तंत्र भी होना चाहिए। इस डेटाबेस का इस्तेमाल सिर्फ बाल यौन शोषण सामग्री के लिए ही किया जाए, किसी और कंटेंट के लिए नहीं। कोर्ट ने प्राथमिक स्कूल स्तर से ही बच्चों में ऑनलाइन खतरों को लेकर जागरूकता अभियान शुरू करने का भी आह्वान किया, ताकि वे खतरे को पहचानें और मदद मांगने में संकोच न करें।

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