नई दिल्ली: कर्नाटक हाईकोर्ट ने आरक्षण के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार के 2022 के एक कानून को खारिज कर दिया, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण को बढ़ाने का प्रावधान था। इस फैसले से राज्य में आरक्षण की सीमा फिर से पुरानी स्थिति में आ गई है। दरअसल इस कानून के तहत अनुसूचित जाति यानी एससी का आरक्षण 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत कर दिया गया था। वहीं अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का आरक्षण 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया गया था। इससे कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा पार कर 56 प्रतिशत हो गया था।
कानून को तत्कालीन बसवराज बोम्मई सरकार के समय पारित किया गया था। राज्यपाल की मंजूरी के बाद 12 जनवरी 2023 को इसे राजपत्र में प्रकाशित किया गया था।
अदालत ने क्यों किया रद्द?
मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और जस्टिस के एस हेमलेखा की पीठ ने साफ कहा कि यह कानून संविधान के खिलाफ है। अदालत के मुताबिक, अधिनियम की धारा-3 शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण बढ़ाकर 50 प्रतिशत की सीमा तोड़ती है। यह अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करती है। धारा-4 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण बढ़ाने का प्रावधान था, जिसे अदालत ने अनुच्छेद 14 और 16 के खिलाफ बताया। दोनों प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया गया।
50 प्रतिशत की सीमा का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंदिरा साहनी मामले में आरक्षण के लिए 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा तय की थी। बाद के कई फैसलों में भी इस सीमा को कायम रखा गया। इन्हीं आधार पर हाईकोर्ट में दो याचिकाओं के जरिए इस कानून को चुनौती दी गई थी। अदालत ने इन्हीं मिसालों को ध्यान में रखकर फैसला सुनाया।
उपमुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वर ने इस फैसले को गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि इससे सामाजिक न्याय, शिक्षा और सरकारी नौकरियों पर असर पड़ेगा। उन्होंने न्यायपालिका का सम्मान जताते हुए कहा कि यह फैसला पूर्व भाजपा सरकार की जवाबदेही और केंद्र की निष्क्रियता पर सवाल उठाता है। यह फैसला आरक्षण की सीमा को लेकर फिर से चर्चा छेड़ रहा है। राज्य सरकार अब आगे क्या कदम उठाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।











