नई दिल्ली: कई बार किसी अपने से झगड़ा होने के बाद बात खत्म हो जाती है, लेकिन मन की परेशानी खत्म नहीं होती। सामने वाला आपसे ठीक से बात भी कर ले, माफी मांग ले या मामला शांत हो जाए, फिर भी दिमाग उसी बात में उलझा रहता है। बार-बार सोच में पड़ जाते है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ, मैंने ऐसा क्यों कहा या सामने वाले ने वह बात क्यों कही। बात खत्म हो गई पर मन अभी भी वही पर लगा है कि आखिर क्यों हुआ वो सब और यही सोच-सोचकर हम अपने दिमाग में एक अलग ही दुनिया बसा लेते हैं। अगर आपके साथ भी ऐसा होता है तो इसे आसान भाषा में ऐसे अगर समझें तो ऐसे इमोशनल हैंगओवर कहा जा सकता है। इसका मतलब है कि झगड़ा या तनाव खत्म होने के बाद भी उसका असर कुछ समय तक मन और सोच पर बना रहना।
झगड़ा खत्म होने के बाद भी मन क्यों परेशान रहता है?
झगड़े के दौरान हम सिर्फ सामने वाले की बातें नहीं सुनते। उसके बोलने का तरीका, आवाज, गुस्सा और कही गई हर बातें भी हमारे मन पर असर डालती हैं। जैसे की उसने कितने गुस्से से बोला था या फिर गुस्से में सामान को भी इधर से उधर फेका था। उस समय हम कई तरह की भावनाएं महसूस करते हैं। बात खत्म होने के बाद माहौल भले ही शांत हो जाए, लेकिन दिमाग उस घटना को तुरंत छोड़ नहीं पाता है। इसी वजह से मन भारी लगने लगता है और बार-बार उसी बातचीत के बारे में सोचने का मन करता है। कभी-कभी तो छोटी सी बहस भी पूरे दिन का मूड खराब कर देती हैं।
बार-बार वही बातें क्यों याद आती हैं?
जब किसी बात से हमें ज्यादा दुख पहुंचता है तो दिमाग उसे बार-बार दोहराने लगता है। हम सोचते रहते हैं कि उस समय मुझे क्या कहना चाहिए था या सामने वाले ने मेरी बात समझने की कोशिश क्यों नहीं की। वो बस अपनी ही चला रहे थे मेरी भी तो सुनते, मेरी क्या गलती थी, ऐसा भी क्या बोल दिया था मैंने, जो बात इतनी बढ़ गई। अगर झगड़ा बिना किसी साफ नतीजे के खत्म हुआ हो, तो यह बेचैनी और बढ़ जाती है। मन में कई सवाल रह जाते हैं और हम उन्हीं सवालों के जवाब ढूंढते रहते हैं और इसीलिए हमें बार-बार वही बातें याद आती रहती हैं।
एक झगड़ा पुराने दुख भी सामने ले आता है
कई बार आज की लड़ाई सिर्फ आज की नहीं होती है। नई बहस के दौरान पुराने झगड़े, पुराने ताने या ऐसी कुछ बातें भी याद आने लगती हैं, जिन्हें हम काफी समय से भूलने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कर नहीं पाते हैं क्यों की वह हर बार याद आ जाती है जैसे कि पिछली तुमने ऐसा बोला था और वही बात फिर से बोल दी जाती है।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आपको अपने पार्टनर की कोई छोटी सी बात इसलिए ज्यादा परेशान करती है, क्योंकि उससे जुड़ी कोई पुरानी घटना पहले से आपके मन में चल रही थी या फिर उस बात को अभी तक आप भूल ही नहीं पाए थे। बस इसी वजह से लगता है कि सारी पुरानी बातें एक साथ वापस आ गई हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत कोई बड़ा फैसला लेने के बजाय खुद को थोड़ा समय देना बेहतर होता है। और जितना हो सके चुप रहना चाहिए वरना बात और बढ़ जाएगी या फिर आप वहां से उठ कर किसी और शांति वाली जगह पर जाकर बैठ जाए।
इमोशनल हैंगओवर में क्या महसूस होता है?
हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है। किसी को बेचैनी महसूस होती है तो किसी का किसी से बात करने का मन नहीं करता। कुछ लोगों को बार-बार वही बातचीत याद आती रहती है। इसके अलावा मन भारी होना, चिड़चिड़ापन, उदासी, गुस्सा या रिश्ते को लेकर ज्यादा सोचते रहते हैं। कुछ लोग तो इतना गुम हो जाते है उस बात में की दो-चार दिन तक वही सोचते रहते है कि आखिर क्यों हुआ ऐसा या फिर मेरी क्या गलती थी और भी बहुत कुछ। जरूरी नहीं कि हर झगड़े के बाद ऐसा हो, लेकिन अगर कोई बात दिल पर ज्यादा लग जाए तो उसका असर कुछ समय तक रह सकता है।
झगड़े के बाद खुद को कैसे संभालें?
सबसे पहले खुद को थोड़ा समय दें। झगड़े के तुरंत बाद हर बात को सुलझाना जरूरी नहीं होता है। जब गुस्सा और दुख थोड़ा कम हो जाए, तब बातचीत करना ज्यादा आसान होता है। और सामने वाला भी आपको समझता है और दोनों समझ पाते हैं कि गलती कहा पर हुई थी। आप तभी उसका सलूशन निकाल पाएंगे ताकि दोबारा वही गलती न हो।
जब पार्टनर से बात करें तो सीधे आरोप लगाने के बजाय अपनी भावना बताने की कोशिश करें। जैसे, “तुम हमेशा ऐसा करते हो” कहने के बजाय “उस बात से मुझे बहुत बुरा लगा” कहना बातचीत को ज्यादा शांत रख सकता है। जब आपको ज्यादा गुस्सा आए तो आपको कुछ देर अकेले बैठना, टहलना, पानी पीना या किसी भरोसेमंद दोस्त से बात कर सकते हैं जिससे आपके मन को हल्का महसूस होगा।
कब समझें कि मामला सिर्फ एक झगड़े तक सीमित नहीं है?
अगर हर छोटी बात के बाद लंबे समय तक मन परेशान रहता है, रिश्ते में बात करने से डर लगता है या बार-बार तनाव और बेचैनी महसूस होती है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हो सकता है कि रिश्ते में कोई ऐसी बात हो जिसे दोनों ने ठीक से समझने या सुलझाने की कोशिश नहीं की है। ऐसे में शांत होकर आपस में बात करना मददगार हो सकता है। जरूरत महसूस हो तो किसी काउंसलर की मदद भी ले सकती है। रिश्तों में मतभेद होना सामान्य है। हर झगड़े का मतलब रिश्ता खराब होना नहीं होता। लेकिन झगड़ा खत्म होने के बाद मन पर जो असर रह जाता है, उसे समझना भी उतना ही जरूरी है। कभी-कभी रिश्ते को संभालने से पहले खुद को संभालना भी जरूरी होता है।












