नई दिल्ली: 300 रुपये का एक खीरा, 850 रुपये किलो का नींबू और 680 रुपये किलो का टमाटर, नॉर्वे की एक दुकान में सब्जियों के ये दाम देखकर किसी भी भारतीय की आंखें फटी रह जाएं। लेकिन वहां रह रहे एक भारतीय शख्स ने इन कीमतों को देखकर सिर्फ महंगाई पर हैरानी नहीं जताई, बल्कि एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया, जो अब पूरे सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन गया है।
एक्स यूजर विनोद ने नॉर्वे की एक लोकल ग्रॉसरी स्टोर का वीडियो साझा किया, जिसमें ऑर्गेनिक नींबू करीब 850 रुपये किलो, टमाटर लगभग 680 रुपये किलो और एक खीरा तकरीबन 300 रुपये का दिखाई दे रहा था। विनोद ने बताया कि नॉर्वे में इतने साल रहने के बावजूद जब भी वे दुकान जाते हैं, तो ये कीमतें हर बार उन्हें चौंका देती हैं।
भारत की कीमतों से की तुलना
अपनी पोस्ट में विनोद ने इन दामों की तुलना भारत से भी की। उनके अनुसार भारत में नींबू लगभग 90 से 110 रुपये किलो, टमाटर 60 से 80 रुपये किलो और खीरा करीब 20 से 30 रुपये प्रति पीस के हिसाब से मिल जाता है। हालांकि भारत में सब्जियों के दाम शहर, मौसम और क्वालिटी के हिसाब से लगातार बदलते रहते हैं, इसलिए इन आंकड़ों को पूरे देश की औसत कीमत नहीं माना जा सकता। लेकिन विनोद का असली सवाल इन दामों की तुलना से भी आगे का था।
किसान तक कितना पहुंचता है पैसा
विनोद ने पूछा कि जब भारत में कोई ग्राहक किसी सब्जी के लिए पैसे चुकाता है, तो उस रकम का कितना हिस्सा असल में उस किसान तक पहुंचता है, जिसने वह सब्जी उगाई थी। उनका सवाल सिर्फ कीमतों की तुलना नहीं, बल्कि यह समझने की कोशिश थी कि खेत से बाजार तक पहुंचने की इस पूरी यात्रा में सब्जी की कीमत कितनी बार बदलती है और अंत में किसान के हाथ में कितना बचता है।
विनोद की इस पोस्ट के बाद चर्चा सिर्फ नॉर्वे की महंगी सब्जियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारत की कृषि सप्लाई चेन पर भी सवाल उठने लगे। कुछ यूजर्स ने दावा किया कि कई बार किसान को ग्राहक की चुकाई गई अंतिम कीमत का पूरा फायदा नहीं मिल पाता, क्योंकि सप्लाई चेन के अलग-अलग स्तरों पर कीमत बढ़ती चली जाती है। हालांकि यह भी सच है कि इस अंतर के लिए सिर्फ बिचौलियों को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा, क्योंकि परिवहन, मंडी शुल्क, भंडारण, छंटाई और खराब होने वाली उपज जैसी कई लागतें भी अंतिम कीमत को प्रभावित करती हैं।
असली मुद्दा सिर्फ कीमत नहीं
नॉर्वे में 300 रुपये के खीरे को देखकर हैरान होना इस पूरी कहानी की बस शुरुआत भर है। असली बहस उस सवाल पर पहुंचती है, जो सीधे भारत के हर किसान और ग्राहक से जुड़ा है। जब ग्राहक 100 रुपये चुकाकर कोई सब्जी खरीदता है, तो उसमें किसान का हिस्सा असल में कितना होता है, यही सवाल इस वायरल वीडियो को विदेश की महंगाई की कहानी से आगे ले जाकर भारत की कृषि व्यवस्था को समझने का एक बड़ा मौका बनाता है।












