सिद्धिविनायक मंदिर पहुंचीं दीपिका पादुकोण, 900 साल पुरानी पटोला विरासत में दिखा मॉम-टू-बी ग्लो

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Deepika Padukone
Instagram (mayyurgirotracouture)

नई दिल्ली: बॉलीवुड की सबसे पसंदीदा जोड़ियों में से एक दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह जल्द ही अपने घर में एक और नन्हे मेहमान का स्वागत करने जा रहे हैं। अपनी दूसरी प्रेग्नेंसी के इस खास पड़ाव पर यह खूबसूरत जोड़ी बप्पा का आशीर्वाद लेने मुंबई के प्रसिद्ध सिद्धिविनायक मंदिर पहुंची। ठीक वैसे ही जैसे साल 2024 में अपनी बेटी ‘दुआ’ के जन्म से पहले दोनों मंदिर दर्शन करने गए थे। इस भक्तिमय दौरे के दौरान होने वाली मां दीपिका का ट्रेडिशनल लुक हर किसी का दिल जीत रहा है। अपने बेबी बंप को बेहद सादगी और नजाकत से फ्लॉन्ट करते हुए दीपिका ने जो आउटफिट पहना, उसका सीधा संबंध भारत की 900 साल पुरानी समृद्ध वस्त्र कला और विरासत से है।

मयूर गिरोत्रा के पटोला कुर्ते में छाया मॉम-टू-बी ग्लो

मंदिर दर्शन के लिए दीपिका ने फैशन डिजाइनर मयूर गिरोत्रा का तैयार किया कस्टम पारंपरिक एन्सेंबल पहना। उनका लुक सिल्क के पटोला प्रिंट पर आधारित था, जिसमें चटक रंग और पारंपरिक रूपांकन नजर आए। 
ढीले-फ्लोई कुर्ते के साथ उन्होंने पर्पल बॉटम और टिश्यू सिल्क का बुना दुपट्टा पेयर किया। दुपट्टे पर नाजुक एप्लिक वर्क था। पर्पल और गोल्डन टोन का यह एथनिक कॉम्बिनेशन उनके मॉम-टू-बी ग्लो को और निखार रहा था।

बारीक जरदोजी वर्क 

इस ट्रेडिशनल कुर्ते के गोल नेकलाइन को एंटीक जरदोजी की बारीक गोल्डन एम्ब्रॉयडरी से हाइलाइट किया गया था, जबकि बाकी हिस्से पर पीले, लाल, हरे और सफेद रंगों के मिश्रण से बना पटोला पैटर्न बेहद आकर्षक लग रहा था। पारंपरिक क्राफ्ट को आधुनिक सिल्हूट के साथ मिलाने का यह अंदाज ही इसे बेहद खास और रॉयल फील दे रहा था। प्रेग्नेंसी फैशन को ध्यान में रखते हुए डिजाइनर ने कुर्ते की फिटिंग को काफी ढीला और आरामदायक रखा, ताकि मूवमेंट में आसानी रहे और बेबी बंप भी हल्का फ्लॉन्ट हो सके। भारी-भरकम काम की जगह जीवंत रंगों के पैटर्न ने इस एथनिक वियर को एक क्लासी फिनिश दी।

गुजरात का 900 साल पुराना ऐतिहासिक पटोला इतिहास

दीपिका पादुकोण का यह आउटफिट सिर्फ फैशन का हिस्सा नहीं, बल्कि गुजरात की सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करता है। पटोला बुनाई का इतिहास लगभग 900 साल पुराना माना जाता है, जो विशेष रूप से 11वीं और 12वीं सदी में पाटन के राजघरानों और समृद्ध वर्ग में प्रतिष्ठा का प्रतीक रहा है। पाटन के साल्वी समुदाय के कारीगरों ने इस अद्भुत कला को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा है। पटोला को तैयार करने की प्रक्रिया ‘डबल इकत’ तकनीक पर आधारित होती है, जो बेहद जटिल और मेहनत भरी होती है। इसमें ताने और बाने दोनों धागों को बुनाई से पहले डिजाइन के अनुसार बांधकर रंगा जाता है। हाथकरघे पर एक साड़ी या कपड़ा तैयार करने में कारीगरों को कई महीनों से लेकर एक साल तक का लंबा समय लग जाता है।

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