नई दिल्ली: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब ग्लोबल ऑयल मार्केट पर साफ दिखाई देने लगा है. पश्चिम एशिया में युद्ध तेज होने की आशंका के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत 101 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है. वहीं, WTI क्रूड करीब 97.20 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. कच्चे तेल की इस तेजी से भारत की आर्थिक चिंता भी बढ़ सकती है.
पेट्रोल-डीजल ही नहीं, इन चीजों पर भी असर
कच्चा तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता.प्लास्टिक, पेंट, केमिकल और कॉस्मेटिक्स जैसे कई उत्पादों में पेट्रोलियम से जुड़े कच्चे माल का इस्तेमाल होता है. ऐसे में लंबे समय तक तेल की कीमत ऊंची रहने पर इन चीजों की लागत बढ़ सकती है.
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर देश का इंपोर्ट बिल भी बढ़ जाता है. इसके लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं, जिससे रुपये और महंगाई पर भी दबाव बन सकता है.
तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव
फिलहाल घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कई हफ्तों से बड़ा बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतें सरकारी तेल कंपनियों के लिए चुनौती बन रही हैं. कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय कीमत के मुकाबले घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने पर मार्जिन का नुकसान उठाना पड़ सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा हालात में तेल कंपनियों को पेट्रोल और खासकर डीजल पर नुकसान का सामना करना पड़ रहा है. अगर कच्चा तेल और महंगा होता है तो इस दबाव के बढ़ने की आशंका है.
कब मिलेगी राहत?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण तेल सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. होर्मुज जलडमरूमध्य भी बेहद अहम है, क्योंकि वैश्विक तेल और LNG का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है.
जब तक क्षेत्र में तनाव कम नहीं होता और सप्लाई सामान्य नहीं होती, तब तक कच्चे तेल की कीमतों में राहत की संभावना सीमित रह सकती है. इसका मतलब है कि फिलहाल पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की उम्मीद कमजोर पड़ सकती है और महंगे कच्चे तेल से जुड़ी दूसरी चीजों की कीमतों पर भी नजर रखनी होगी.












