USS गेराल्ड आर. फोर्ड की एंट्री से मिडिल ईस्ट में हलचल, ट्रंप ने ईरान को दी चेतावनी

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नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही बातचीत के बीच एक बार फिर हालात गरमा गए हैं. कूटनीतिक कोशिशों के साथ-साथ अब सैन्य ताकत का प्रदर्शन भी तेज हो गया है. इसी कड़ी में अमेरिका ने दुनिया के सबसे बड़े और आधुनिक विमानवाहक पोत USS गेराल्ड आर. फोर्ड को पारस की खाड़ी की ओर रवाना करने का फैसला किया है. यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है, जब दोनों देशों के बीच समझौते की कोशिशें जारी हैं लेकिन भरोसे की कमी साफ नजर आ रही है.

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यह तैनाती रणनीतिक संदेश देने के लिए की जा रही है. पहले खबर थी कि USS जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश को भेजा जाएगा, लेकिन बाद में फैसला बदलकर फोर्ड को चुना गया. इससे पहले यह पोत कैरेबियन सागर में तैनात था और वेनेजुएला से जुड़े एक अभियान का हिस्सा बताया गया था. अब इसे मिडिल ईस्ट भेजा जा रहा है और अनुमान है कि यह अप्रैल के अंत या मई तक अपने बेस नॉरफोक नहीं लौटेगा.

कितना ताकतवर है फोर्ड?

गेराल्ड आर. फोर्ड क्लास का यह पहला विमानवाहक पोत है, जिसे 2017 में सेवा में शामिल किया गया था. यह करीब 337 मीटर लंबा और एक लाख टन से ज्यादा वजन वाला विशाल जहाज है. इस पर एक साथ दर्जनों लड़ाकू विमान तैनात किए जा सकते हैं. इसमें आधुनिक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम और एडवांस्ड अरेस्टिंग तकनीक लगी है, जिससे विमान तेजी और सुरक्षा के साथ उड़ान भर सकते हैं. हजारों सैनिक और कई एस्कॉर्ट जहाज इसके साथ चलते हैं, जो इसे एक चलती-फिरती हवाई ताकत बना देते हैं.

ट्रंप का कड़ा रुख

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने साफ कहा है कि अगर ईरान के साथ परमाणु समझौते की बातचीत नाकाम रही तो अमेरिका सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा. उन्होंने यह भी दोहराया कि या तो नई डील होगी या फिर कड़ी कार्रवाई की जाएगी. ट्रंप पहले भी 2018 में पुराने परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका को बाहर निकाल चुके हैं और अब वे ईरान पर ज्यादा सख्त शर्तें लागू करना चाहते हैं.

ईरान पर आरोप है कि वह यूरेनियम को उच्च स्तर तक समृद्ध कर रहा है, जिसे अमेरिका और इजरायल खतरे के रूप में देखते हैं. गाजा संघर्ष, हूती हमले और इजरायल-ईरान तनातनी के बीच मिडिल ईस्ट पहले से अस्थिर है. ऐसे माहौल में अमेरिका अपने सहयोगियों को भरोसा दिलाने और ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम सीधे युद्ध की तैयारी नहीं बल्कि “संदेश” देने की कोशिश है. अमेरिका यह दिखाना चाहता है कि वह बातचीत के साथ-साथ ताकत दिखाने के लिए भी तैयार है. हालांकि, अगर बातचीत सफल नहीं होती तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं. 

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