15 साल बाद रोहिणी नक्षत्र में जन्मेंगे कान्हा, उज्जैन में खास होगी जन्माष्टमी, अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र का संयोग

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Janmashtami 2026
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नई दिल्ली: अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव इस बार 4 सितंबर को बेहद खास और दुर्लभ संयोग के साथ मनाया जाएगा। पूरे 15 साल के लंबे अंतराल के बाद इस जन्माष्टमी पर द्वापर युग जैसी स्थिति बन रही है, जब भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का अद्भुत महासंगम एक साथ हो रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में इसी तिथि, नक्षत्र और वृष राशि के चंद्रमा की उपस्थिति में हुआ था। वर्षों बाद बन रहे इस दुर्लभ योग के कारण इस बार वैष्णव, रामानंदी और गृहस्थ समेत सभी संप्रदायों के लोग एक ही दिन श्रद्धा और उत्साह के साथ कान्हा का जन्मोत्सव मनाएंगे। जन्माष्टमी के पावन अवसर पर महाकाल की नगरी उज्जैन के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में भव्य धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

मध्यरात्रि में अष्टमी और रोहिणी का दुर्लभ संगम

अक्सर जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि तो मिल जाती है, लेकिन रोहिणी नक्षत्र का संयोग नहीं बन पाता। कई बार चंद्रमा तो वृष राशि में रहता है, पर नक्षत्र पीछे छूट जाता है। इस बार सभी मुख्य ज्योतिषीय तत्व एक साथ आ रहे हैं। 
रामानंदी संप्रदाय में रोहिणी नक्षत्र में जन्मोत्सव मनाने का विशेष महत्व माना गया है। भाद्रपद की अर्धरात्रि में जब रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि का मिलन होगा, उस समय की गई पूजा-अर्चना को अत्यधिक फलदायी और मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला माना जा रहा है।

श्रृंगार की तैयारियां

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर महाकाल की नगरी उज्जैन के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में भव्य धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। भरतपुरी स्थित इस्कॉन मंदिर में तड़के से ही श्रद्धालुओं का तांता लगेगा, जहां भगवान राधा मोहन का पंचामृत अभिषेक कर उन्हें दिव्य वस्त्रों, आभूषणों और ताजे पुष्पों से सजाया जाएगा। सिंधिया ट्रस्ट के ऐतिहासिक श्री द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में विशेष पूजन-अभिषेक के बाद ढोली बुआ का पारंपरिक कीर्तन होगा और रात ठीक 12 बजे मुख्य महाआरती की जाएगी। वहीं, भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा स्थली सांदीपनि आश्रम में भी सुबह से लेकर मध्यरात्रि तक दर्शन, पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला अनवरत चलेगा।

माखन-मिश्री का विशेष भोग

धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार जन्माष्टमी की मुख्य पूजा मध्यरात्रि में कान्हा के जन्म के समय ही की जाती है। सबसे पहले बाल गोपाल की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। इसके बाद नटखट कान्हा का भव्य श्रृंगार कर उन्हें सुंदर पालने में झूला झुलाया जाता है। भगवान को सबसे प्रिय माखन-मिश्री, पंजीरी, फल, मेवे और तुलसी दल मिला पंचामृत अर्पित किया जाता है। प्रभु के पास उनकी प्रिय बांसुरी रखकर धूप-दीप जलाकर आरती की जाती है। अंत में आरती के बाद भक्त अपने व्रत का पारण करते हैं और प्रसाद का वितरण होता है।

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