नई दिल्ली: हिंदू धर्म में चातुर्मास को साधना, भक्ति और आत्मचिंतन के लिए बेहद खास समय माना जाता है. इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और इसी वजह से कई तरह के शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. इस साल चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई से होने जा रही है. अगले चार महीने तक भक्त पूजा-पाठ, व्रत, जप और धार्मिक नियमों का पालन करेंगे.
हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है. इसी दिन से चातुर्मास शुरू होता है और कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवोत्थान एकादशी तक चलता है. इस दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु सृष्टि के पालनहार हैं और उनके विश्राम के दौरान विवाह सहित कई शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं.
पौराणिक मान्यता के अनुसार, आषाढ़ मास में भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी. इसके बाद उन्होंने तीन कदमों में पूरी सृष्टि नाप ली. भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बनाया और उसकी रक्षा का वचन दिया. मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु अपने अलग-अलग स्वरूपों के माध्यम से राजा बलि के लोक की रक्षा करते हैं. इस अवधि को धार्मिक साधना और आत्मशुद्धि के लिए बहुत शुभ माना जाता है. आइए पंडित शैलेंद्र पांडेय जी से जानते हैं कि चातुर्मास के चार महीनों में किस देवता की पूजा करनी चाहिए और किन नियमों का पालन करना शुभ माना जाता है.
किस महीने किस देवता की पूजा करें?
आषाढ़- आषाढ़ मास के अंतिम दिनों में भगवान वामन और गुरु पूजा का विशेष महत्व होता है. इसी कारण आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. इस दिन गुरु का सम्मान और पूजा करने की परंपरा है.
श्रावण (सावन)- सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है. इस दौरान शिवलिंग पर जल चढ़ाने और भगवान शिव की पूजा करने से सुख, विवाह और लंबी आयु की कामना की जाती है.
भाद्रपद- भाद्रपद का महीना भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए विशेष माना जाता है. इसी महीने जन्माष्टमी का पर्व आता है. भक्त इस दौरान कृष्ण नाम का जाप और पूजा-पाठ करते हैं.
आश्विन- आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है. वहीं, शुक्ल पक्ष में शारदीय नवरात्र के दौरान देवी दुर्गा और शक्ति की उपासना का महत्व होता है.
कार्तिक- कार्तिक मास में भगवान विष्णु और माता तुलसी की पूजा की जाती है. देवोत्थान एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के बाद विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत फिर से हो जाती है.
चातुर्मास के दौरान किन कार्यों से बचें?
चातुर्मास में कई तरह के मांगलिक कार्यों को रोक दिया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में विवाह के शुभ मुहूर्त नहीं होते. इसलिए शादी-विवाह जैसे संस्कारों को देवोत्थान एकादशी तक टालने की परंपरा है. इस दौरान नए घर में गृह प्रवेश और नींव पूजन जैसे कार्य भी नहीं किए जाते. बच्चों के मुंडन और जनेऊ या उपनयन संस्कार को भी इस अवधि में टालना शुभ माना जाता है. इसी तरह नया व्यापार शुरू करने या किसी बड़े मांगलिक कार्य की शुरुआत से भी बचने की सलाह दी जाती है.
भोजन को लेकर क्या हैं नियम?
चातुर्मास के दौरान भोजन को लेकर भी कई धार्मिक नियम बताए गए हैं. मान्यता है कि इस अवधि में सात्विक और हल्का भोजन करना चाहिए. कई लोग दिन में केवल एक बार भोजन करने का संकल्प लेते हैं. भोजन में प्याज, लहसुन, मांसाहार और मदिरा से दूर रहने की परंपरा है. फल और पानी का सेवन अधिक करने तथा अनाज का कम उपयोग करने की सलाह दी जाती है. इस दौरान शरीर के साथ-साथ मन को भी शांत रखने और अधिक से अधिक समय पूजा, ध्यान और भक्ति में लगाने पर जोर दिया जाता है.
विशेष लाभ के लिए करें ये उपाय
चातुर्मास के चारों महीनों में अलग-अलग धार्मिक उपायों का विशेष महत्व माना जाता है. गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा और उनका आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता है. सावन में भगवान शिव की उपासना करें. भाद्रपद में श्रीकृष्ण की भक्ति और नाम जाप करें. आश्विन महीने में पितरों का श्राद्ध और देवी पूजा करें. कार्तिक मास में भगवान विष्णु और तुलसी माता की पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है. इस दौरान दीपदान और धार्मिक साधना का भी महत्व बताया गया है











