एवरेस्ट का डेथ जोन, जहां शव बन जाते हैं लैंडमार्क, क्यों नामुमकिन है उन्हें वापस लाना?

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Everest's death zone, where bodies become landmarks, why is it impossible to bring them back
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नई दिल्ली: दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट जितनी आकर्षक दिखाई देती है, उतनी ही खतरनाक भी मानी जाती है. क्या आप जानते है बर्फ से ढकी इन चोटियों पर आज भी सैकड़ों पर्वतारोहियों के शव मौजूद हैं, जिन्हें अत्यधिक ऊंचाई और कठिन परिस्थितियों के कारण नीचे नहीं ला सका है. वहीं अब खबर सामने आई है कि भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) ने एक ऐसा मिशन शुरू किया है, जो पर्वतारोहण इतिहास के सबसे चुनौतीपूर्ण अभियानों में गिना जा रहा है.

शव वापस लाने तैयारी 

बता दें, करीब तीन दशक पहले एवरेस्ट पर जान गंवाने वाले ITBP के एक पर्वतारोही का शव वापस लाने के लिए विशेष तैयारी की गई है. वहीं इस काम के लिए एक अनुभवी शेरपाओं की एक टीम को जिम्मेदारी सौंपी गई है, जो दुनिया के सबसे खतरनाक क्षेत्रों में से एक माने जाने वाले ‘डेथ जोन’ तक पहुंचेगी. 

जानकारी के अनुसार, साल 1996 में एवरेस्ट पर आए भीषण बर्फीले तूफान ने कई पर्वतारोहियों की जान ले ली थी. इसी हादसे में ITBP के तीन जवान भी शहीद हो गए थे. उनमें से एक का शव आज तक एवरेस्ट के उत्तरी मार्ग पर मौजूद है. वर्षों से यह स्थान पर्वतारोहियों के लिए एक पहचान बिंदु के रूप में जाना जाता रहा है. अब ITBP ने अपने साथी को सम्मानपूर्वक वापस लाने का संकल्प लिया है.

8,000 मीटर से अधिक ऊंचाई 

वहीं समुद्र तल से 8,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र को ‘डेथ जोन’ कहा जाता है. यहां ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम हो जाता है, जिससे शरीर सामान्य रूप से काम नहीं कर पाता. इतना ही नहीं अत्यधिक ठंड और तेज हवाओं के बीच किसी भी व्यक्ति का जीवित रहना बेहद कठिन हो जाता है. यही वजह है कि इस क्षेत्र में रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना बेहद जोखिम भरा माना जाता है.

कब हो चुकी कितनी मौतें

पर्वतारोहण से जुड़े आंकड़ों के अनुसार एवरेस्ट पर अब तक 340 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 200 से ज्यादा शव आज भी अलग-अलग स्थानों पर मौजूद हैं. कई शव गहरी दरारों और खतरनाक ढलानों पर फंसे हुए हैं, जहां पहुंचना भी आसान नहीं है. ITBP का यह मिशन केवल एक रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं, बल्कि अपने साथी के प्रति सम्मान और कर्तव्य भावना का प्रतीक माना जा रहा है.

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