वाशिंगटन और यरुशलम में बदले राजनीतिक समीकरणों ने पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़त के बाद राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को संसद के दोनों सदनों में विरोध का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी तरफ इजरायल में हुए संसदीय मतदान के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बहुमत जुटाने की कठिन चुनौती से जूझ रहे हैं। ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान में दोनों नेताओं ने अब तक एक-दूसरे का साथ दिया है, लेकिन घरेलू राजनीति में बढ़ते दबाव ने उनकी साझा रणनीति को मुश्किल स्थिति में पहुंचा दिया है। तेहरान में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के कई महीने गुजरने के बावजूद संघर्ष का निर्णायक अंत नहीं हुआ। सैन्य मोर्चे पर स्थायी सफलता नहीं मिली और बातचीत के जरिए भी तनाव समाप्त करने का रास्ता नहीं निकला। अब सवाल यह है कि क्या राजनीतिक मजबूरियां दोनों नेताओं को समझौते की ओर ले जाएंगी या टकराव और गहरा होगा।
अमेरिकी चुनावी नतीजों ने ट्रंप की मुश्किलें बढ़ाईं
मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेट्स ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी ने सीनेट की कम से कम सात सीटें हासिल कीं। इनमें कंसास, आयोवा, टेक्सास, ओहियो, मेन, नॉर्थ कैरोलिना और साउथ कैरोलिना शामिल हैं। इसके अतिरिक्त दो दर्जन से अधिक ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में भी डेमोक्रेट्स सफल रहे, जहां वर्ष 2024 में ट्रंप को बड़ी बढ़त मिली थी। जनवरी 2027 में नई कांग्रेस के कामकाज शुरू करने पर ट्रंप प्रशासन के सैन्य फैसलों, बजट और नियुक्तियों की जांच तेज हो सकती है। हकीम जेफ्रीज के प्रतिनिधि सभा का अध्यक्ष बनने की संभावना भी जताई जा रही है। ट्रंप ने चुनावी परिणामों को अपना व्यक्तिगत नुकसान मानने से इनकार किया है।
महंगाई और ईरान अभियान बना मतदाताओं की नाराजगी
चुनावी सर्वेक्षणों में घरेलू अर्थव्यवस्था और विदेशी सैन्य कार्रवाई दोनों को लेकर असंतोष सामने आया। रॉयटर्स के अनुसार लगभग 90 प्रतिशत मतदाताओं ने महंगाई को अहम मुद्दा माना, जबकि 66 प्रतिशत ने कीमतें बढ़ने के लिए राष्ट्रपति को जिम्मेदार ठहराया। एपी के मतदाता सर्वेक्षण में करीब 60 प्रतिशत लोगों ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को गलत बताया। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण तेल और डीजल की कीमतों में उछाल ने अमेरिकी परिवारों के खर्च पर भी असर डाला। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक ट्रंप ने विदेशी युद्धों से दूरी बनाने का वादा किया था, लेकिन ईरान और वेनेजुएला में उलझने से उनकी स्थिति कठिन हुई है।
होर्मुज के आसपास सैन्य गतिविधियां जारी
मतदान से कुछ घंटे पहले, 2 नवंबर को अमेरिका ने होर्मुज क्षेत्र के नजदीक ईरानी ठिकानों पर हमले किए। ईरानी मीडिया ने केशम, हेंगाम द्वीप और बंदर अब्बास के आसपास धमाकों की खबर दी। अमेरिकी अधिकारियों ने कार्रवाई को रक्षात्मक बताते हुए कहा कि निशाना एक एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल ठिकाना था। ट्रंप ने इसे सीमित हमला बताया। क्षेत्र में नौसैनिक नाकेबंदी जारी है और एक अन्य अमेरिकी विमानवाहक पोत भी वहां की दिशा में बढ़ रहा है।
नेतन्याहू के सामने बहुमत जुटाने की चुनौती
27 अक्टूबर के इजरायली चुनाव में नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गठबंधन को 120 सदस्यीय नेसेट में 53 सीटें मिलीं। सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सदस्यों का समर्थन जुटाने में गठबंधन पीछे रह गया। गादी आइसेनकोट के विपक्षी गठबंधन को 48 और अरब दलों को 19 सीटें मिलीं। नेतन्याहू ने चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगाए, लेकिन चुनाव आयोग ने संगठित धांधली के दावों को खारिज कर दिया।
कतर की मध्यस्थता से बातचीत की उम्मीद
कतर के माध्यम से अप्रत्यक्ष वार्ता जारी है। ईरान बातचीत से पहले नौसैनिक नाकेबंदी हटाने, तेल प्रतिबंधों में राहत और लेबनान में युद्धविराम चाहता है। अमेरिका दूसरी ओर परमाणु संवर्धन कार्यक्रम और होर्मुज में ईरान की सैन्य गतिविधियां बंद कराने की मांग कर रहा है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बातचीत से समाधान निकलने की उम्मीद जताई है।
क्या युद्ध का दायरा फिर बढ़ सकता है?
रिपोर्ट के अनुसार नेतन्याहू ने अमेरिकी चुनाव के बाद ईरान पर बड़े हवाई हमले करने का आग्रह किया था, हालांकि ट्रंप ने तत्काल ऐसी कार्रवाई की स्पष्ट सहमति नहीं दी। जनवरी 2027 से अमेरिकी संसद में युद्ध के खर्च और औचित्य पर सवाल उठेंगे, जबकि इजरायल में नेतन्याहू को सरकार बनाने की चुनौती रहेगी। आने वाले सप्ताह तय करेंगे कि कतर की मध्यस्थता शांति का रास्ता खोलती है या राजनीतिक दबाव इस संघर्ष को और खतरनाक मोड़ पर ले जाता है।












