व्यवस्था की मर्यादा भी जरूरी, छोटे संगठनों की आवाज भी रहे बुलंद

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नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में धरना-प्रदर्शनों के प्रमुख केंद्र जंतर-मंतर को लेकर प्रशासनिक कदमों के बीच अब शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की मांग उठने लगी है। विश्व हिन्दू परिषद के इंद्रप्रस्थ प्रांत के उपाध्यक्ष एवं इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण न्यास के अध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार गुप्ता ने इस विषय पर अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासनिक कदम उठाना आवश्यक हो सकता है लेकिन यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कुछ बड़े संगठनों की गतिविधियों का खामियाजा छोटे सामाजिक, धार्मिक और जनहितकारी संगठनों को न भुगतना पड़े।

सुरेन्द्र कुमार गुप्ता के अनुसार लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन जनता को अपनी समस्याएं, मांगें और शिकायतें सरकार तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। हालांकि जब कोई आंदोलन अपनी निर्धारित मर्यादाओं से आगे बढ़कर आम नागरिकों के आवागमन सार्वजनिक सेवाओं और रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने लगता है, तब कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन का हस्तक्षेप भी जरूरी हो जाता है। ऐसे मामलों में व्यवस्था और नागरिकों की सुविधा को प्राथमिकता देना स्वाभाविक है, लेकिन किसी भी निर्णय में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले समूहों की जरूरतों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

बड़े संगठनों की गतिविधियों का खामियाजा छोटे समूह क्यों भुगतें?

गुप्ता ने कहा कि देश के दूर-दराज के क्षेत्रों से अनेक छोटे संगठन अपनी समस्याओं और मांगों को लेकर दिल्ली पहुंचते हैं। इन संगठनों के पास न तो बड़े स्तर पर भीड़ जुटाने के पर्याप्त संसाधन होते हैं और न ही व्यापक प्रचार-प्रसार के साधन। उनके लिए जंतर-मंतर जैसे स्थान पर शांतिपूर्वक अपनी बात रखना सरकार और संबंधित अधिकारियों तक अपनी आवाज पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है।

उनका मानना है कि जब बड़े संगठन अपनी संख्या  राजनीतिक प्रभाव अथवा शक्ति का प्रदर्शन करते हुए निर्धारित नियमों और मर्यादाओं की अनदेखी करते हैं, तो प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं। लेकिन ऐसे निर्णयों का असर उन छोटे संगठनों पर भी पड़ सकता है, जिनका उद्देश्य केवल अपनी मांगों को उचित मंच पर रखना होता है। इसलिए जरूरी है कि प्रशासनिक व्यवस्था बनाते समय सभी प्रकार के संगठनों की परिस्थितियों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए।

उन्होंने विपक्षी दलों और सीजेपी जैसे संगठनों से जुड़े विरोध-प्रदर्शनों के संदर्भ में भी कहा कि किसी भी संगठन को अपने आंदोलन के दौरान आम जनता की सुविधाओं और सार्वजनिक व्यवस्था का ध्यान रखना चाहिए। आंदोलन चाहे राजनीतिक हो अथवा सामाजिक, उसकी सफलता केवल भीड़ की संख्या से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य, अनुशासन और जनहित के प्रति संवेदनशीलता से भी आंकी जानी चाहिए।

छोटे प्रदर्शनों के लिए 200 लोगों तक की व्यवस्था का सुझाव

सुरेन्द्र कुमार गुप्ता ने समस्या के समाधान के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार करने का सुझाव दिया है। उनके प्रस्ताव के अनुसार जंतर-मंतर पर अधिकतम 200 लोगों तक के छोटे शांतिपूर्ण और पूर्व अनुमति प्राप्त प्रदर्शनों के लिए व्यवस्था बनाई जा सकती है। वहीं जिन संगठनों को बड़े स्तर पर रैली या प्रदर्शन करना हो उनके लिए रामलीला मैदान जैसे अपेक्षाकृत बड़े स्थल निर्धारित किए जा सकते हैं।

उनका मानना है कि इस प्रकार की व्यवस्था से छोटे संगठनों को अपनी बात रखने का अवसर मिल सकता है और बड़े आयोजनों को भी उनकी क्षमता तथा सुरक्षा संबंधी जरूरतों के अनुरूप स्थान उपलब्ध कराया जा सकता है। हालांकि इस प्रस्ताव को लागू करना प्रशासन के अधिकार क्षेत्र संबंधित स्थल की उपलब्धता, सुरक्षा मानकों और लागू नियमों के अनुरूप ही संभव होगा। इस संबंध में अंतिम निर्णय सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारियों को लेना होगा।

विरोध का अधिकार, लेकिन अराजकता की छूट नहीं

गुप्ता ने स्पष्ट किया कि सरकार की नीतियों की आलोचना करना और अपनी मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराना लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन विरोध के नाम पर आम नागरिकों के आवागमन को बाधित करना सार्वजनिक जीवन को ठप करना अथवा निर्धारित नियमों की अवहेलना करना किसी भी आंदोलन की उचित मर्यादा नहीं हो सकती।

उन्होंने कहा कि राजनीतिक और गैर-राजनीतिक बड़े और छोटे सभी संगठनों को अपने आंदोलनों में अनुशासन बनाए रखना चाहिए। दूसरी ओर प्रशासन को भी ऐसी व्यवस्था विकसित करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए जिसमें सुरक्षा और जनसुविधाओं के साथ शांतिपूर्ण असहमति के लिए उचित अवसर उपलब्ध रहें।

व्यवस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच बने संतुलन

सुरेन्द्र कुमार गुप्ता का कहना है कि लोकतंत्र की मजबूती केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने से नहीं, बल्कि नागरिकों की जायज समस्याओं को सुनने और उनके समाधान के रास्ते खुले रखने से भी होती है। यदि शांतिपूर्ण विरोध के लिए उपयुक्त और स्पष्ट नियमों वाली व्यवस्था उपलब्ध हो तो अनावश्यक टकराव की आशंका कम करने में मदद मिल सकती है।

उन्होंने ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें न अराजकता को बढ़ावा मिले न छोटे संगठनों की आवाज अनसुनी हो और न ही किसी संगठन को अपनी संख्या-शक्ति के बल पर आम जनता की सुविधाओं की अनदेखी करने का अवसर मिले।

Reported by: Pankaj Rai

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