नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच एक बड़ी कूटनीतिक हलचल सामने आई है। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने के लिए अमेरिका के सामने एक नया प्रस्ताव रखा है। ईरान का कहना है कि अगर अमेरिका उसकी तीन शर्तों को मान लेता है, तो महज सात दिनों के भीतर यह अहम समुद्री रास्ता फिर से खोल दिया जाएगा, और इसके साथ ही दोनों देशों के बीच रुकी हुई परमाणु वार्ता भी दोबारा शुरू हो सकती है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के मुताबिक, यह प्रस्ताव कतर के जरिए अमेरिका तक पहुंचाया गया है। उनका कहना है कि इसमें जो भी कदम उठाने की मांग की गई है, वे बिल्कुल नए नहीं हैं, बल्कि जून महीने में हुए समझौते का ही हिस्सा थे। उनके मुताबिक, जैसे ही अमेरिका इस प्रस्ताव को स्वीकार करेगा, वहीं से सात दिन की गिनती शुरू हो जाएगी।
अमेरिका के सामने रखी गईं तीन प्रमुख शर्तें
ईरान ने अपने प्रस्ताव में अमेरिका से तीन बड़े कदम उठाने को कहा है। पहली शर्त यह है कि ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को पूरी तरह हटाया जाए। दूसरी मांग है कि ईरान के तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में राहत दी जाए। और तीसरी शर्त यह है कि एक ऐसा युद्धविराम लागू किया जाए, जिसमें लेबनान को भी शामिल किया जाए। अराघची का कहना है कि अमेरिका अगर चाहे तो इन कदमों को महज चार से पांच दिनों में पूरा कर सकता है, जिसके बाद छठे दिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोल दिया जाएगा और सातवें दिन दोनों देशों के बीच बातचीत का सिलसिला फिर शुरू हो जाएगा।
‘दबाव में नहीं झुकेगा ईरान’
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब्बास अराघची ने साफ कहा कि अब पूरा फैसला अमेरिका के हाथ में है। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि ईरान किसी भी तरह के दबाव, धमकी या डराने की रणनीति को स्वीकार नहीं करेगा और अपने संप्रभु अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा। उनके मुताबिक, इस समझौते के लिए जरूरी सारी तैयारियां पहले से पूरी हैं, बस अमेरिका की तरफ से हामी भरने की देर है।
ट्रंप-शी की मुलाकात में भी उठा जिक्र
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक में भी मिडिल ईस्ट के इस संकट का जिक्र हुआ। रॉयटर्स के मुताबिक, शी जिनपिंग ने ट्रंप से अपील की कि वे ईरान के साथ पहले हुए समझौते पर वापस लौटें। दरअसल चीन के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बेहद अहम है, क्योंकि यहां से गुजरने वाली तेल आपूर्ति में किसी भी रुकावट का सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।
इस पूरी कूटनीतिक हलचल के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियान ने चीन के समर्थन की खुलकर सराहना की। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि बातचीत के जरिए मतभेद सुलझाने के पक्ष में खड़े होने के लिए वे शी जिनपिंग के आभारी हैं।
जून के समझौते के टूटने की वजह
गौरतलब है कि ईरान का यह नया प्रस्ताव जून में हुए उस समझौते से काफी मिलता-जुलता है, जिसमें 60 दिनों की अंतरिम अवधि तय की गई थी। हालांकि यह व्यवस्था ज्यादा समय तक टिक नहीं पाई और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों पर हमले फिर से शुरू हो गए थे, जिसके बाद से दोनों देशों के बीच भरोसे की भारी कमी बनी हुई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब ईरान की इस नई कोशिश को लेकर अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। हालांकि पहले कुछ खाड़ी देशों ने ईरान से बातचीत दोबारा शुरू करने का समर्थन किया था, लेकिन यमन में हूती विद्रोहियों के बढ़ते हमलों और सऊदी की पाइपलाइन पर हुए हमलों ने हालात को और जटिल बना दिया है। गौरतलब है कि जंग शुरू होने से पहले दुनिया के कुल तेल-गैस कारोबार का करीब 20 फीसदी हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरता था, जिससे यहां का कोई भी संकट सीधे पूरी दुनिया पर असर डालता है।












