सर्दी आएगी, धुंध छाएगी, सांसों पर संकट मंडराएगा, सरकार का प्लान अगर जमीन पर उतरा, तभी दिल्ली मुस्कुराएगी!

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नई दिल्ली: दिल्ली में सर्दियों की आहट शुरू होते ही राजधानी की हवा एक बार फिर चिंता का विषय बनने लगी है। अक्टूबर से फरवरी तक दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ना कोई नई बात नहीं है। हर साल सर्दियों के मौसम में जहरीली हवा, धूल, धुआं और बढ़ता वायु प्रदूषण दिल्लीवासियों की परेशानी बढ़ा देता है। इस बार भी प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने एक्शन प्लान तैयार किया है, ग्रैप व्यवस्था लागू करने की तैयारी है और प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों पर नियंत्रण के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि कागज पर तैयार किया गया प्लान राजधानी की सड़कों और गलियों में कितना दिखाई देगा?

सरकार की तैयारियों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर समझने के लिए जनभावना टाइम्स की टीम ने दिल्ली के अलग-अलग इलाकों का जायजा लिया। पर्यावरणविद् ओंकार तिवारी से जब सरकार की तैयारियों को लेकर बात की गई तो उन्होंने माना कि सरकार का प्लान बेहतर है, लेकिन असली चुनौती उसके जमीनी स्तर पर प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन की है। यानी योजना बनाना एक बात है और उसे धरातल पर उतारना दूसरी।

गाजीपुर का कूड़े का पहाड़ बना बड़ा सवाल

ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान टीम सबसे पहले दिल्ली के गाजीपुर इलाके में पहुंची। यहां कूड़े का विशाल पहाड़ लंबे समय से स्थानीय लोगों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। कूड़े के निस्तारण और प्रसंस्करण के दौरान उठने वाली धूल और आसपास फैलने वाला कचरा हवा की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके लिए प्रदूषण केवल सर्दियों की समस्या नहीं है। कूड़े के पहाड़ और उससे जुड़ी धूल-गंदगी के कारण उन्हें सालभर परेशानी झेलनी पड़ती है। जब हवा चलती है तो आसपास के इलाकों में धूल और दुर्गंध का असर और ज्यादा महसूस होता है।स्थानीय लोगों का कहना है कि दिल्ली में प्रदूषण का मौसम भले ही सर्दियों में चरम पर पहुंचता हो, लेकिन गाजीपुर जैसे इलाकों में प्रदूषण की परेशानी बारह महीने बनी रहती है।

मलबे की धूल ने बढ़ाई चिंता

सरकार जहां प्रदूषण कम करने के लिए सड़क की धूल और निर्माण सामग्री पर नियंत्रण की बात कर रही है, वहीं राजधानी की सड़कों पर मलबा खुलेआम ले जाने और गिराए जाने की तस्वीरें एक अलग ही कहानी बयां करती हैं। ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान कई जगह ट्रक और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में मलबा ले जाते वाहन दिखाई दिए। सड़क किनारे मलबा गिराए जाने से धूल उड़ती है और आसपास का वातावरण प्रभावित होता है। कई जगहों पर सड़क के किनारे जमा मलबा दूर तक दिखाई देता है।स्थानीय निवासी देवेंद्र सिंह का कहना है कि यदि प्रदूषण को वास्तव में नियंत्रित करना है तो केवल कागजी कार्रवाई या चालान काटने से काम नहीं चलेगा। सड़कों पर उड़ती धूल और खुले में पड़े निर्माण मलबे पर प्रभावी कार्रवाई जरूरी है।

पीयूसी सेंटरों पर भी बढ़ी भीड़

प्रदूषण नियंत्रण के लिए सरकार ने वाहनों के प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र यानी पीयूसी को अनिवार्य करने पर जोर दिया है। इसके चलते इन दिनों पीयूसी केंद्रों पर वाहन चालकों की भीड़ दिखाई दे रही है। लोग पीयूसी प्रमाणपत्र बनवाने के लिए कतार में खड़े नजर आ रहे हैं। हालांकि कई वाहन मालिकों का सवाल है कि केवल पीयूसी प्रमाणपत्र अनिवार्य करने और बिना पीयूसी पेट्रोल नहीं देने से दिल्ली की हवा कितनी साफ होगी?लोगों का कहना है कि वाहनों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण का एक हिस्सा है, लेकिन इसके अलावा निर्माण कार्यों से उठने वाली धूल, खुले में पड़ा मलबा, सड़क की धूल, कूड़े का निस्तारण और अन्य प्रदूषणकारी गतिविधियों पर भी समान रूप से कार्रवाई की जरूरत है।

पार्किंग शुल्क दोगुना सवालों के घेरे में फैसला

प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सरकार ने सर्दियों के दौरान पार्किंग शुल्क बढ़ाने की योजना भी सामने रखी है। प्रस्ताव के मुताबिक पार्किंग शुल्क में बढ़ोतरी का उद्देश्य निजी वाहनों के इस्तेमाल को हतोत्साहित करना और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना है।

लेकिन आम लोगों के बीच इसे लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।

लोगों का कहना है कि यदि प्रदूषण कम करना है तो सार्वजनिक परिवहन को और मजबूत किया जाए यातायात व्यवस्था बेहतर की जाए और प्रदूषण के अन्य बड़े स्रोतों पर भी सख्ती की जाए। उनका सवाल है कि पार्किंग शुल्क बढ़ने से आखिर प्रदूषण पर कितना असर पड़ेगा और इसका आर्थिक बोझ किस पर पड़ेगा?

ग्रैप पर टिकी निगाहें

दिल्ली में सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण बढ़ने पर ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान यानी ग्रैप के अलग-अलग चरण लागू किए जाते हैं। प्रदूषण की स्थिति बिगड़ने पर निर्माण गतिविधियों वाहनों और अन्य प्रदूषणकारी गतिविधियों पर अलग-अलग स्तर की पाबंदियां लगाई जाती हैं।सरकार की तैयारियां इस बार भी दिखाई दे रही हैं।

लेकिन दिल्लीवासियों के लिए असली सवाल घोषणाओं का नहीं उनके असर का है।

क्या खुले में पड़े मलबे पर कार्रवाई होगी?
क्या कूड़े के पहाड़ों से निकलने वाली धूल पर प्रभावी नियंत्रण होगा?
क्या सड़कों की धूल कम होगी?
क्या प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों और गतिविधियों पर समान रूप से कार्रवाई होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या ग्रैप की पाबंदियां कागज से निकलकर जमीन पर दिखाई देंगी?

दिल्ली की सांसों का इम्तिहान

हर साल सर्दियों में दिल्ली की हवा को लेकर बड़े-बड़े दावे और योजनाएं सामने आती हैं। कुछ दिनों के लिए सड़कों पर सख्ती दिखाई देती है, जांच बढ़ती है और प्रदूषण नियंत्रण के उपाय तेज किए जाते हैं। लेकिन मौसम बदलते ही कई व्यवस्थाएं फिर पुराने ढर्रे पर लौटती दिखाई देती हैं। इस बार सरकार ने प्रदूषण से निपटने के लिए एक्शन प्लान तैयार किया है। योजना कितनी मजबूत है इसका जवाब आने वाले दिनों में आंकड़े देंगे। लेकिन गाजीपुर से लेकर राजधानी की सड़कों तक दिखाई दे रही जमीनी तस्वीर यह सवाल जरूर खड़ा कर रही है कि दिल्ली की हवा को साफ करने के लिए क्या केवल नियम काफी हैं या उनके सख्त और लगातार अमल की भी उतनी ही जरूरत है।

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