ईरान युद्ध का खर्च कौन उठाएगा? ट्रंप ने अरब देशों से मांगी मदद

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ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव अब एक नए मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है. व्हाइट हाउस की ओर से संकेत मिले हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस संघर्ष के भारी आर्थिक बोझ को कम करने के लिए अरब देशों से मदद लेने पर विचार कर रहे हैं. यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं और युद्ध के खत्म होने के संकेत साफ नहीं हैं.

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि ट्रंप युद्ध की लागत को साझा करने के लिए अरब देशों से सहयोग लेने में रुचि रखते हैं. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति इस मुद्दे पर आगे भी चर्चा कर सकते हैं और इसे लेकर बातचीत के विकल्प खुले हैं.

ईरान का सख्त रुख, शर्तों पर अड़ा

दूसरी ओर, ईरान ने अपने रुख को लेकर कोई नरमी नहीं दिखाई है. ईरान के वरिष्ठ सैन्य सलाहकार मोहसेन रेज़ाई ने साफ कहा है कि जब तक उनकी सभी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक संघर्ष खत्म नहीं होगा. उन्होंने कहा कि ईरान को हुए नुकसान की भरपाई, आर्थिक प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना और भविष्य में अमेरिका के हस्तक्षेप से बचाव की गारंटी मिलना जरूरी है. इन शर्तों के बिना किसी समझौते की संभावना नहीं है.

पर्दे के पीछे जारी है बातचीत

हालांकि सार्वजनिक तौर पर दोनों देशों के बीच सख्ती दिख रही है, लेकिन व्हाइट हाउस ने दावा किया है कि बातचीत का सिलसिला जारी है. कैरोलिन लीविट के अनुसार, ईरान के साथ अप्रत्यक्ष बातचीत आगे बढ़ रही है और सकारात्मक दिशा में है. उन्होंने यह भी कहा कि जो बातें सार्वजनिक रूप से सामने आती हैं, वे निजी बातचीत से काफी अलग होती हैं. उनके मुताबिक, ईरानी वार्ताकार पर्दे के पीछे ज्यादा व्यावहारिक रवैया अपना रहे हैं.

युद्ध की अवधि पर ट्रंप का अनुमान

व्हाइट हाउस ने यह भी संकेत दिया कि यह संघर्ष कितने समय तक चल सकता है. लीविट के अनुसार, ट्रंप का मानना है कि यह युद्ध करीब चार से छह सप्ताह तक चल सकता है. उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में संघर्ष लगभग एक महीने के आसपास पहुंच चुका है.

होर्मुज जलडमरूमध्य बना अहम मुद्दा

इस पूरे घटनाक्रम में होर्मुज जलडमरूमध्य की भूमिका भी अहम बनी हुई है. अमेरिका इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को फिर से सुरक्षित और चालू करने की कोशिश कर रहा है. हालांकि, व्हाइट हाउस ने साफ किया कि यह एकमात्र लक्ष्य नहीं है, बल्कि व्यापक सैन्य उद्देश्यों को हासिल करना ज्यादा जरूरी है.

ईरान में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती को लेकर भी स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है. लीविट ने कहा कि इस विकल्प को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है. उन्होंने बताया कि पेंटागन राष्ट्रपति के सामने कई रणनीतिक विकल्प रख रहा है, जिन पर जरूरत के हिसाब से फैसला लिया जाएगा.

विवादित बयानों पर सफाई

ट्रंप द्वारा ईरान के जल संयंत्रों को निशाना बनाने संबंधी बयान पर भी सवाल उठे. इस पर लीविट ने कहा कि अमेरिकी सेना हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में रहकर काम करती है. हालांकि उन्होंने यह भी दोहराया कि अमेरिका अपने सभी सैन्य लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है.

व्हाइट हाउस ने यह संकेत भी दिया कि अगर बातचीत सफल नहीं होती है, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है. अमेरिका ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा है कि यह उसके लिए सही निर्णय लेने का मौका है, अन्यथा उसे कड़े परिणामों का सामना करना पड़ सकता है.

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