दिल्ली एयरपोर्ट पर मंडराया खतरा! जेवर एयरपोर्ट बना एयरलाइंस की पहली पसंद?

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देश को एक और आधुनिक एयर कनेक्टिविटी का तोहफा मिल गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोएडा इंटरनेशनल ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट (जेवर एयरपोर्ट) का उद्घाटन कर दिया है. इस एयरपोर्ट के शुरू होने से न केवल यात्रियों को सुविधा मिलेगी, बल्कि दिल्ली-NCR के एविएशन नेटवर्क में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. हालांकि जहां आम लोगों में उत्साह है, वहीं एयरलाइंस कंपनियों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है.

ग्रेटर नोएडा के जेवर में बना यह नया एयरपोर्ट राजधानी के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से करीब 72 किलोमीटर दूर है. अब तक दिल्ली एयरपोर्ट ही इस क्षेत्र का मुख्य केंद्र था, लेकिन जेवर एयरपोर्ट के चालू होने से ट्रैफिक का दबाव बंटने की उम्मीद है. इससे यात्रियों को ज्यादा विकल्प मिलेंगे और भीड़भाड़ भी कम हो सकती है.

एयरलाइंस की चिंता की असली वजह

एयरलाइंस कंपनियों की परेशानी का मुख्य कारण दोनों राज्यों में ईंधन (ATF) पर लगने वाला टैक्स है. दिल्ली में एयर टर्बाइन फ्यूल पर करीब 25% VAT लगाया जाता है, जिससे इसकी कीमत काफी बढ़ जाती है. वहीं उत्तर प्रदेश में यह टैक्स बेहद कम है, जिसके चलते यहां फ्यूल सस्ता पड़ता है.

इस अंतर का सीधा असर एयरलाइंस के खर्च पर पड़ता है. उदाहरण के तौर पर, दिल्ली से मुंबई जाने वाली एक सामान्य उड़ान में करीब 4 टन फ्यूल लगता है. अगर यही फ्यूल दिल्ली में भरा जाए तो कंपनियों को प्रति फ्लाइट लगभग 96,000 रुपये ज्यादा खर्च करने पड़ सकते हैं, जबकि यूपी में यही खर्च काफी कम हो जाता है.

एविएशन एक्सपर्ट्स का मानना है कि लागत कम करने के लिए एयरलाइंस कंपनियां अब फ्यूल भरवाने के लिए जेवर एयरपोर्ट को प्राथमिकता दे सकती हैं. अगर ऐसा होता है, तो इससे दिल्ली एयरपोर्ट से कुछ ट्रैफिक जेवर की ओर शिफ्ट हो सकता है. इससे NCR के एयर ट्रैफिक का संतुलन बदलने की संभावना है.

यात्रियों के लिए सस्ती उड़ानों की उम्मीद

फ्यूल सस्ता होने का फायदा यात्रियों तक पहुंच सकता है. अगर एयरलाइंस की लागत कम होती है, तो वे किराए में भी कुछ कमी कर सकती हैं. हालांकि अभी तक किसी भी कंपनी ने टिकट के दाम घटाने का आधिकारिक ऐलान नहीं किया है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दोनों राज्यों के बीच टैक्स का अंतर बरकरार रहता है, तो इसका सीधा असर दिल्ली एयरपोर्ट के ट्रैफिक पर पड़ेगा. भविष्य में सरकारें अगर टैक्स स्ट्रक्चर में बदलाव करती हैं, तो स्थिति बदल सकती है. 

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