पाकिस्तान में एक बार फिर सांप्रदायिक तनाव की चिंगारी भड़कती नजर आ रही है. इस बार विवाद की वजह बने हैं आसिम मुनीर, जिनके एक बयान ने शिया समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी है. ईरान में चल रहे अमेरिका और इजरायल के हमलों को लेकर की गई उनकी टिप्पणी ने पुराने जख्मों को फिर से हरा कर दिया है.
पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने शिया धर्मगुरुओं को संबोधित करते हुए कहा कि अगर उन्हें ईरान की इतनी चिंता है, तो वे वहीं जाकर रह सकते हैं. उनका यह बयान सीधे तौर पर शिया समुदाय को निशाना बनाता हुआ माना जा रहा है. इस टिप्पणी के बाद देशभर में बहस तेज हो गई और शिया समुदाय में असंतोष की खबरें सामने आने लगीं.
पाकिस्तान की गहरी सामाजिक दरार
यह मामला सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की उस गहरी सामाजिक दरार को उजागर करता है, जो दशकों से मौजूद है. पाकिस्तान में सुन्नी मुसलमान बहुसंख्यक हैं और सत्ता के केंद्र में भी उनकी ही पकड़ मजबूत रही है. वहीं, शिया समुदाय को अक्सर भेदभाव और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है. हालांकि पाकिस्तान, ईरान के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शिया आबादी वाला देश है, जहां करीब 2.5 से 4 करोड़ शिया रहते हैं. इसके बावजूद उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाता.
शियाओं के खिलाफ हिंसा
पाकिस्तान में कई कट्टरपंथी संगठन खुलेआम शियाओं के खिलाफ भड़काऊ भाषण देते रहे हैं. कई बार उन्हें “काफिर” तक कहा जाता है और उनके खिलाफ हिंसा को सही ठहराने की कोशिश की जाती है. ऐसे माहौल में शिया समुदाय खुद को असुरक्षित महसूस करता है.
गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे इलाकों में, जहां शियाओं की बड़ी आबादी है, वहां विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा और फायरिंग की घटनाएं भी सामने आई हैं. कराची में भी इस तरह के तनाव की खबरें मिलती रही हैं. पाकिस्तान में शिया समुदाय के धार्मिक आयोजनों, खासकर मुहर्रम के जुलूस, भारी सुरक्षा के बीच निकाले जाते हैं. यह स्थिति बताती है कि वहां सांप्रदायिक सौहार्द कितना कमजोर है.
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना खुद शिया समुदाय से जुड़े इस्माइली खोजा मत के अनुयायी थे. इसके बावजूद आज देश में शियाओं को बराबरी और सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.
















