यूपी सरकार और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच जारी विवाद पर अब भाजपा के भीतर से भी आवाजें उठने लगी हैं. पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने शंकराचार्य होने के प्रमाण मांगे जाने को प्रशासनिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया है.
उमा भारती का तीखा बयान
मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता उमा भारती ने इस मामले में सकारात्मक समाधान की उम्मीद जताई है, लेकिन प्रशासनिक कदमों पर सवाल भी उठाए हैं.
योगी सरकार को किया टैग
उमा भारती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट साझा करते हुए यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय को भी टैग किया, जिससे मामला राजनीतिक हलकों में चर्चा का केंद्र बन गया.
“प्रशासन ने अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन किया” — उमा भारती
अपने पोस्ट में उमा भारती ने लिखा,
“मुझे विश्वास है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज एवं उत्तर प्रदेश सरकार के बीच कोई सकारात्मक समाधान निकल आएगा, किंतु प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा शंकराचार्य होने का सबूत मांगना, यह प्रशासन ने अपनी मर्यादाओं एवं अधिकारों का उल्लंघन किया है, यह अधिकार तो सिर्फ शंकराचार्यों का एवं विद्वत परिषद का है.”
किन संस्थानों को किया गया टैग
इस पोस्ट में उमा भारती ने बीजेपी मध्य प्रदेश, बीजेपी उत्तर प्रदेश, यूपी सीएम ऑफिस और ज्योतिर्मठ को टैग किया है.
माघ मेला विवाद से शुरू हुआ मामला
मौनी अमावस्या के दिन माघ मेले में हुई घटनाओं को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए अनशन शुरू किया था. इसके बाद से यह मुद्दा संत समाज और श्रद्धालुओं के बीच चर्चा में बना रहा.
प्रयागराज मेला प्राधिकरण की नोटिस
प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने उच्चतम न्यायालय की नोटिस का हवाला देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था, जिससे विवाद और गहरा गया.
शंकराचार्य की मान्यता पर क्या बोले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद
नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि शंकराचार्य वही होता है, जिसे अन्य तीन पीठों के शंकराचार्य मान्यता देते हैं.
द्वारका और श्रृंगेरी पीठ का हवाला
उन्होंने दावा किया कि द्वारका पीठ और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य उन्हें शंकराचार्य मानते हैं और पिछले माघ मेले में वे दोनों शंकराचार्यों के साथ स्नान भी कर चुके हैं.
“फिर किस प्रमाण की जरूरत?” — शंकराचार्य
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सवाल उठाया कि जब द्वारका और श्रृंगेरी के शंकराचार्य यह कह रहे हैं कि वही शंकराचार्य हैं, तो फिर यह प्रमाण मांगने की जरूरत क्यों है.









