
नई दिल्ली: ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव ने मध्य पूर्व को युद्ध की दहलीज पर ला खड़ा कर दिया है. तेहरान पर इजराइली हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन दोनों देशों की सीमाएं 2100 से 2300 Km दूर होने से जमीनी युद्ध असंभव है. ऐसे में हवाई हमलों में मिसाइलें ही मुख्य हथियार बन गई हैं. दोनों राष्ट्रों की मिसाइल क्षमताओं की तुलना से पता चलता है कि ईरान अपनी स्वदेशी तकनीक पर मजबूत है, जबकि इजराइल अमेरिकी समर्थन से लैस है.
यह संघर्ष न केवल सैन्य शक्ति की परीक्षा है, बल्कि वैश्विक शक्तियों की भूमिका को भी उजागर कर रहा है. ईरान उत्तर कोरिया और चीन की मदद से मिसाइलें विकसित कर निर्यात तक कर रहा है, वहीं इजराइल का एंटी-मिसाइल सिस्टम दुनिया में प्रसिद्ध है. आइए विस्तार से जानें दोनों पक्षों की मिसाइल ताकत और उनके पीछे खड़े देशों के बारे में.
ईरान की मिसाइल क्षमता का विस्तार
इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने उत्तर कोरिया और चीन के सहयोग से मिसाइल विकास शुरू किया और अब वह इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो चुका है. ईरान कई देशों को मिसाइलें निर्यात करता है, जिसमें रूस भी शामिल है. रूस ईरान को फाइटर जेट और हेलीकॉप्टर प्रदान करता है, जबकि ईरान उसे मिसाइलें देता है. ईरान की कई मिसाइलें बेहद घातक हैं, जैसे सेजिल, जो 17 हजार किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक गति से उड़ती है और 2500 Km तक मार कर सकती है.
इसके अलावा खेबर, शहाब-3 और इमाद-1 की रेंज 2000 किलोमीटर तक है, जिन्हें ईरान ने अपग्रेड कर और मजबूत बनाया है. नतांज परमाणु केंद्र में आंतरिक न्यूक्लियर रेडिएशन के दावे भी हो रहे हैं.
हाईपरसोनिक मिसाइलों से मजबूत ईरान
पिछले वर्षों में शहाब-3 और शहाब-4 मिसाइलों की चर्चा रही है. शहाब-3 ईरान की मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का आधार है, जो लिक्विड प्रोपेलेंट से चलती है और 1650 पाउंड तक पेलोड ले जा सकती है. शहाब-4 की रेंज 1240 मील है और यह 2200 पाउंड तक का हमला कर सकती है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शहाब-3 के नए वैरिएंट गदर और एमाद हैं. ईरान ने फतह-1 नामक नई हाईपरसोनिक मिसाइल का उपयोग शुरू किया है, जिसकी गति ध्वनि की गति से पांच गुना अधिक (3800 से 6100 Km/hr) है. विशेषज्ञों का कहना है कि फतह-1 का वारहेड किसी भी रक्षा प्रणाली से बच सकता है.
परमाणु सक्षम मिसाइलें और अन्य हथियार
2023 में अमेरिकी एयरफोर्स जनरल केनेथ मैकेंजी ने कांग्रेस को बताया कि ईरान के पास 3000 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें हैं. हज कासिम, फतह-110, फतह-360 और जोल्फघर सिस्टम भी ईरान के पास हैं. फतह 500 किलो तक पेलोड ले जा सकती है, जबकि जोल्फघर 700 Km तक भारी हथियार पहुंचा सकती है. ईरान की ख-55 क्रूज मिसाइलें 3000 Km तक मार कर सकती हैं और परमाणु वारहेड ले जाने में सक्षम हैं. एडवांस एंटी-शिप मिसाइल खालिद फरज भी ईरान के पास है.
इसके अलावा इमाद, बद्र और खोर्रमशहर लिक्विड प्रोपेलेंट मिसाइलों का इस्तेमाल संभव है. ईरान पर हमले में इजराइली पोपेये मिसाइल का नाम उछला है.
इजराइल की उन्नत मिसाइल प्रणालियां
इजराइल के पास अमेरिका में डिजाइन की गई हार्पून एंटी-शिप क्रूज मिसाइल है, जो 1977 से सेवा में है और अब कई वैरिएंट में उपलब्ध है. इजराइल ने लॉन्ग रेंज आर्टिलरी विकसित की है, जिसकी रेंज 280 किलोमीटर है. गैब्रियल, जेरिको-1, जेरिको-2, जेरिको-3 और डेलिलाह मिसाइलें भी इजराइल के पास हैं. ईरान पर हमले में पोपेये मिसाइल का नाम सबसे अधिक लिया जा रहा है.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इजराइली वायुसेना ने इसे एफ-16डी लड़ाकू विमान से लॉन्च कर ईरानी रडार नष्ट किए. यह इजराइल द्वारा विकसित एयर-टू-सर्फेस मिसाइल है, जो सटीकता, लंबी रेंज और भारी वारहेड के लिए जानी जाती है. यह 340-450 किलो तक हाई एक्सप्लोसिव ले जा सकती है और बंकर, हैंगर, एयरबेस, कमांड सेंटर या रडार सिस्टम को तबाह कर सकती है. इजराइल का आयरन डोम और ऐरो एंटी-मिसाइल सिस्टम विश्व प्रसिद्ध हैं.
अमेरिका का इजराइल को समर्थन
अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करता है और दबाव बनाता रहा है. हालिया हमलों का कारण भी यही बताया जा रहा है. अमेरिका इजराइल का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता है और युद्ध की स्थिति में हथियार सप्लाई बढ़ा सकता है. ईरान से इजराइल पहुंचने के लिए इराक और जॉर्डन की सीमाएं पार करनी पड़ती हैं, जो इजराइल के साथ खड़े दिखते हैं. ईरान के ड्रोन हमलों को जॉर्डन ने अपने हवाई क्षेत्र में रोका और साफ कहा कि वह इजराइल पर हमले के लिए अपना एयरस्पेस इस्तेमाल नहीं होने देगा.
ईरान के साथ खड़े देश
ईरान को इजराइल के खिलाफ तुर्किये, मिस्र, यूएई और सऊदी अरब का साथ मिल सकता है, हालांकि अमेरिकी दबाव में वे तटस्थ रह सकते हैं. तुर्किये ने कभी इजराइल को पहला मान्यता देने वाला मुस्लिम देश होने के बावजूद अब संबंध खराब हैं. चीन, उत्तर कोरिया और रूस ईरान को हथियार प्रदान करने में आगे रहेंगे. चीन और उत्तर कोरिया ईरान के मिसाइल कार्यक्रम के जनक माने जाते हैं.
ये तीनों देश अमेरिका के विरोधी हैं, इसलिए ईरान का साथ देंगे. इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान रूस के करीब आया. इसी साल मार्च (2025) में चीन में हुई बैठक के बाद चीन-रूस ने संयुक्त बयान में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरा समर्थन दिया. युद्ध गहराने पर उत्तर कोरिया भी ईरान के साथ खड़ा होगा.















