
पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरावणे की आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर जारी विवाद अब और गहरा गया है. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस किताब के लीक होने की जांच के लिए बहुराष्ट्रीय स्तर पर छानबीन शुरू कर दी है. सूत्रों के अनुसार रक्षा मंत्रालय से अनिवार्य मंजूरी मिलने से पहले ही यह किताब वैश्विक डिजिटल बाजारों में उपलब्ध हो गई थी.
मंगलवार को दिल्ली पुलिस ने आपराधिक साजिश के आरोप में एफआईआर दर्ज की. यह कदम मीडिया द्वारा उठाए गए सवालों के बाद उठाया गया, जिसमें पूछा गया था कि अनपब्लिश्ड किताब कांग्रेस नेता राहुल गांधी तक कैसे पहुंची. प्रारंभिक जांच में पता चला है कि यह मामला सामान्य पाइरेसी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और समन्वित ऑपरेशन था, जिसने रक्षा से जुड़ी प्रकाशनों की आधिकारिक मंजूरी प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया.
वैश्विक बाजारों में मंजूरी से पहले प्रसार
जांचकर्ताओं ने पाया कि नरावणे की आत्मकथा का लीक वर्जन न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला, बल्कि सबसे पहले विदेशी बाजारों में ऑनलाइन उपलब्ध हुआ. अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी में संचालित प्लेटफॉर्म्स पर इसकी बिक्री के संकेत मिले हैं.
सूत्रों ने बताया कि लीक डेटा का पहला अपलोड एक io डोमेन वाली वेबसाइट पर हुआ. यह ccTLD मूल रूप से ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी के लिए है, लेकिन टेक प्लेटफॉर्म्स और स्टार्टअप्स द्वारा व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है. इसके बाद सामग्री को कई होस्टिंग प्लेटफॉर्म्स पर मिरर कर दिया गया.
ISBN ट्रेल ने जांच को नई दिशा दी
जांच का एक प्रमुख केंद्र लीक कॉपी में मौजूद इंटरनेशनल स्टैंडर्ड बुक नंबर है. यह 13 अंकों का वैश्विक पहचान कोड व्यावसायिक प्रकाशन और वितरण के लिए अनिवार्य होता है. अधिकारियों का कहना है कि ISBN की मौजूदगी से साफ है कि लीक वर्जन कोई कच्चा पांडुलिपि या ड्राफ्ट नहीं, बल्कि प्रोसेस्ड और प्रकाशन-तैयार कॉपी थी.
पेंगुइन इंडिया, जो किताब का प्रकाशक है, से ISBN रजिस्ट्रेशन और वितरण प्रक्रिया के बारे में पूछताछ की जा रही है. ISBN हर किताब के संस्करण और फॉर्मेट के लिए अलग-अलग जारी किया जाता है, जैसे हार्डकवर और ई-बुक. मीडिया ने अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी के ऑनलाइन बुक-सेलिंग प्लेटफॉर्म्स की जांच की तो पाया कि इन वेबसाइट्स पर सूचीबद्ध ISBN कोड पेंगुइन इंडिया के संस्करण ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ से मेल खाते हैं.
संगठित उल्लंघन की आशंका
पुलिस सूत्रों का कहना है कि अपलोड की क्रमबद्धता, अंतरराष्ट्रीय लिस्टिंग और ISBN से जुड़े वितरण बिंदु एक संगठित उल्लंघन की ओर इशारा करते हैं, न कि अलग-थलग डिजिटल पाइरेसी की घटना. एक सूत्र ने कहा कि जांच इस बात की पड़ताल कर रही है कि आधिकारिक मंजूरी से पहले किसने पुस्तक के वैश्विक प्रसार में मदद की और क्या इसे विदेशी बाजारों में पहुंचाने के लिए कोई समन्वित प्रयास किया गया था.
अब जांच अंतरराष्ट्रीय डिजिटल फुटप्रिंट्स, वित्तीय लेन-देन और विदेश में संभावित सहयोगियों तक विस्तारित हो गई है. रक्षा मंत्रालय की ओर से अभी तक इस मामले पर कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया गया है.












