रोजगार संकट ने खाली किए गांव, उत्तर बंगाल से बड़े पैमाने पर पलायन

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नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्सों में रोजगार की कमी अब एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक संकट का रूप ले चुकी है. यहां के गांव तेजी से खाली हो रहे हैं और युवा बेहतर भविष्य की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं.

सिलीगुड़ी और आसपास के इलाकों से सामने आ रही तस्वीरें बताती हैं कि रोजगार के अवसरों के अभाव में लोगों का अपने घर-परिवार से दूर जाना एक मजबूरी बन चुका है. यह स्थिति केवल आर्थिक पिछड़ेपन की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य पर सवाल खड़े कर रही है.

मालदा स्टेशन पर दिखता पलायन का दर्द

सिलीगुड़ी के पास स्थित मालदा टाउन रेलवे स्टेशन पर हर दिन एक अजीब सा माहौल देखने को मिलता है. यहां एक ओर रोजगार की कमी का सन्नाटा है, तो दूसरी ओर अपने सपनों को समेटकर बाहर जाने वाले युवाओं की भीड़.

हर दिन बड़ी संख्या में युवा दिल्ली, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की ओर रवाना हो रहे हैं, जहां उन्हें रोजगार मिलने की उम्मीद है.

रोजाना 1000 से ज्यादा मजदूरों का पलायन

एक अनुमान के मुताबिक, केवल मालदा जिले से ही प्रतिदिन 1000 से अधिक मजदूर काम की तलाश में दिल्ली, मध्य प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों की ओर पलायन कर रहे हैं.

मालदा के अलावा उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर जिलों में भी हालात कुछ ऐसे ही बने हुए हैं.

उद्योगों की कमी बनी बड़ी वजह

उत्तर बंगाल के आठ जिलों में बड़े उद्योगों की भारी कमी है. यही कारण है कि यहां रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं.

उद्योग जगत से जुड़े लोगों के अनुसार, इन इलाकों की भौगोलिक परिस्थितियां भी बड़े उद्योगों की स्थापना में बाधा बनती हैं.

कमजोर परिवहन व्यवस्था से बढ़ती मुश्किलें

परिवहन सुविधाओं की कमी के चलते कच्चा माल और अन्य जरूरी चीजों का आवागमन मुश्किल हो जाता है. कोयले जैसी आवश्यक सामग्री दूर-दराज से मंगवानी पड़ती है, जिससे लागत काफी बढ़ जाती है.

इसी कारण बड़े उद्योग यहां टिक नहीं पाते और छोटी इकाइयों को भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

सिंडिकेट राज और ‘कट मनी’ का असर

छोटे उद्योग शुरू करने में भी ‘सिंडिकेट राज’ और ‘कट मनी’ बड़ी बाधा बन रहे हैं. कई मामलों में उद्योग लगाने की प्रक्रिया शुरुआत में ही अटक जाती है.

जमीन से लेकर निर्माण कार्य तक हर स्तर पर सिंडिकेट का दबाव बना रहता है, जिससे निवेशकों के लिए काम करना मुश्किल हो जाता है.

जमीन से लेकर मजदूर तक, हर जगह दबाव

अगर कोई उद्यमी यहां फैक्ट्री लगाना चाहता है, तो उसे स्थानीय नेताओं को संतुष्ट किए बिना जमीन मिलना मुश्किल होता है. निर्माण कार्य में भी गिट्टी, बालू, ईंट, मजदूर सब कुछ सिंडिकेट से ही लेना पड़ता है, वह भी ऊंची कीमत पर.

इसके अलावा, कारखाने में काम करने वाले कर्मचारियों के चयन पर भी दबाव बनाया जाता है, जिससे निवेशक परेशान होकर अपनी योजनाएं छोड़ देते हैं.

विपक्ष का आरोप, विकास में बाधा

विपक्ष का आरोप है कि यही सिंडिकेट सिस्टम उत्तर बंगाल के विकास में सबसे बड़ी रुकावट बन गया है, जिससे उद्योगों का विस्तार रुक गया है और रोजगार के अवसर नहीं बन पा रहे.

भाजपा सांसद का बयान

दार्जिलिंग से भाजपा सांसद राजू बिस्टा ने कहा,”तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में बंगाल का कभी भला नहीं होगा. भाजपा की डबल इंजन सरकार बनने के बाद माफिया राज खत्म होगा और कल कारखाने लगेंगे.”

उन्होंने यह भी कहा कि इससे युवाओं का पलायन रुकेगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. इस बार विधानसभा चुनाव में बेरोजगारी और पलायन एक बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा है.

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