नई दिल्ली: भारत अपनी विविधता और आस्था के अनूठे रूपों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन केरल के कोल्लम जिले में स्थित कोट्टनकुलंगरा देवी मंदिर का नियम सबसे अलग और अद्भुत है। इस ऐतिहासिक मंदिर में देवी मां के दर्शन और प्रवेश के लिए पुरुषों को पैंट-शर्ट या पारंपरिक कुर्ता-पाजामा छोड़कर बाकायदा महिलाओं का रूप धारण करना पड़ता है। वार्षिक ‘चामयाविलक्कु’ उत्सव के दौरान घटने वाला यह नजारा न केवल देश बल्कि विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए भी कौतूहल का केंद्र बना रहता है। इस दौरान पुरुष न केवल पारंपरिक रेशमी साड़ियां और लहंगे पहनते हैं, बल्कि माथे पर सिंदूर, बिंदी, आंखों में काजल, होठों पर लिपस्टिक और बालों में गजरा लगाकर पूरा सोलह श्रृंगार करते हैं।
सोलह श्रृंगार से जगमगाता परिसर
वार्षिक ‘चामयाविलक्कु’ उत्सव के दौरान मंदिर का पूरा माहौल किसी भव्य सौंदर्य प्रतियोगिता जैसा जान पड़ता है, जहाँ हजारों की संख्या में पुरुष दुल्हन की तरह सज-धजकर पहुंचते हैं। इस दौरान पुरुष न केवल पारंपरिक रेशमी साड़ियां और लहंगे पहनते हैं, बल्कि माथे पर सिंदूर, बिंदी, आंखों में काजल, होठों पर लिपस्टिक और बालों में गजरा लगाकर पूरा सोलह श्रृंगार करते हैं।
भक्तों की इस विशेष तैयारी को आसान बनाने के लिए मंदिर परिसर और आसपास के इलाकों में बाकायदा ब्यूटी पार्लर और मेकअप आर्टिस्ट के कई स्टॉल लगाए जाते हैं।
चरवाहों की सदियों पुरानी पौराणिक कथा
पुरुषों द्वारा नारी रूप धारण करने की इस परंपरा के पीछे एक बेहद दिलचस्प और सदियों पुरानी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। लोक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में कुछ चरवाहे बालक खेल-खेल में लड़कियों के वस्त्र पहनकर एक पवित्र पत्थर की पूजा किया करते थे। उसी दौरान वहां स्वयं भगवती देवी प्रकट हुईं और उन्होंने बालकों की निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया।
तभी से यह दृढ़ विश्वास चला आ रहा है कि यदि कोई पुरुष पूर्ण समर्पण और सच्चे मन से स्त्री का स्वांग रचकर देवी के दरबार में आता है, तो मां उसकी हर मनोकामना पूरी करती हैं।
वैश्विक पहचान तक का सफर
समय बीतने के साथ इस अनूठी परंपरा का दायरा काफी व्यापक हो गया है। पहले जहां केवल स्थानीय ग्रामीण और आसपास के क्षेत्रों के पुरुष ही इस व्रत-अनुष्ठान का हिस्सा बनते थे, वहीं आज के दौर में देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी लोग इस खास मौके पर कोट्टनकुलंगरा देवी मंदिर पहुंचते हैं। आधुनिकता के रंग में ढलने के बावजूद इस सदियों पुरानी आस्था का स्वरूप आज भी पूरी पवित्रता और उत्साह के साथ कायम है।











