प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को दिल्ली में आयोजित एक निजी समाचार चैनल के कार्यक्रम में दुनिया के बदलते राजनीतिक और आर्थिक हालात पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तेजी से बदल रही है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं नई चुनौतियों के अनुरूप खुद को ढालने में कठिनाइयों का सामना कर रही हैं। प्रधानमंत्री ने व्यापार, तकनीक और समुद्री मार्गों को लेकर बढ़ते रणनीतिक तनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि इनका इस्तेमाल अब दबाव बनाने के साधनों के रूप में भी किया जा रहा है। उनके संबोधन में वैश्विक सहयोग, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रभावशीलता और भारत की बढ़ती जिम्मेदारी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष पर राजनीतिक हमला भी किया।
उन्होंने कहा कि जब दुनिया एक नई वैश्विक व्यवस्था की तलाश कर रही है, तब भारत में कुछ लोग अव्यवस्था की उम्मीद लगाए बैठे हैं। कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने सवाल किया कि पार्टी आखिर कब तक एक असफल उत्पाद को दोबारा पेश करने की कोशिश करती रहेगी। यह टिप्पणी राहुल गांधी को लेकर उनके पहले के राजनीतिक तंज की अगली कड़ी के तौर पर सामने आई।
प्रधानमंत्री ने कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि पार्टी दूसरों की राजनीतिक प्रगति में बाधा डालने वाली परजीवी प्रवृत्ति की तरह काम करती है। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस का रवैया व्यवस्था के प्रति नकारात्मक होता गया है।
चाणक्य के सिद्धांत से समझाई वैश्विक व्यवस्था की जरूरत
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में प्राचीन भारतीय विचारक चाणक्य का उल्लेख करते हुए ‘मत्स्य न्याय’ की अवधारणा समझाई। उन्होंने संस्कृत सूत्र ‘अप्रणीतः तु मत्स्यन्यायमुद्भावयति’ का संदर्भ दिया और बताया कि जब कानून तथा दंड व्यवस्था प्रभावी नहीं रहती, तब ताकतवर कमजोर पर हावी होने लगता है। इसे उन्होंने बड़ी मछली द्वारा छोटी मछली को निगल जाने की स्थिति से समझाया।
मोदी के मुताबिक, आज दुनिया को ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत है जो शक्तिशाली देशों को कमजोर राष्ट्रों पर मनमाना दबाव बनाने से रोक सके। उन्होंने कहा कि भारत इसी तरह की व्यवस्था और सहयोग को मजबूत करने की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।
महामारी के दौरान भारत के सहयोग का दिया उदाहरण
भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका पर बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कोविड-19 महामारी के दौर का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संकट के समय भारत ने 100 से अधिक देशों को दवाइयां उपलब्ध कराईं और जरूरतमंद देशों तक मुफ्त टीके पहुंचाने में मदद की। उनके अनुसार, ऐसे प्रयास यह दिखाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी केवल सामान्य परिस्थितियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। संकट के समय भी देशों के बीच सहयोग और सहायता का सिलसिला जारी रहना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत अपनी क्षमताओं को मजबूत कर रहा है, ताकि वैश्विक चुनौतियों से निपटने में और प्रभावी योगदान दिया जा सके।
ग्लोबल साउथ और विकसित भारत 2047 की परिकल्पना
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की आवाज को अधिक महत्व मिलना चाहिए। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और व्यवस्थाओं में इन देशों की चिंताओं को उचित स्थान देना जरूरी है। उन्होंने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य का भी जिक्र किया। प्रधानमंत्री ने इस उद्देश्य को केवल भारत की प्रगति तक सीमित नहीं बताया, बल्कि इसे बेहतर वैश्विक भविष्य से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि भारत का विकास दुनिया के लिए सकारात्मक अवसर पैदा कर सकता है और देश अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए लगातार तैयारी कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा भूमिका और नई चुनौतियां
प्रधानमंत्री ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के ऐतिहासिक संदर्भ को याद किया। उन्होंने कहा कि उस दौर में दुनिया ने सम्मान, सहयोग और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की जरूरत को समझा था। हालांकि, उनके मुताबिक आज चुनौतियों का स्वरूप बदल गया है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी उसी के अनुसार अपनी कार्यप्रणाली विकसित करनी होगी। मोदी ने व्यापार के रणनीतिक इस्तेमाल और समुद्री मार्गों पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि नई वास्तविकताओं को वैश्विक व्यवस्था में जगह देना जरूरी है। उनके संबोधन का मुख्य संदेश यह रहा कि बदलती दुनिया में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को अधिक प्रभावी बनाने के साथ-साथ भारत को भी अपनी वैश्विक भूमिका मजबूत करनी चाहिए।












