गंगा किनारे अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अतिक्रमण हटाने के लिए बिहार सरकार को दी 8 हफ्ते की मोहलत

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नई दिल्ली: गंगा नदी के किनारे बने अवैध निर्माणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का सब्र अब जवाब दे चुका है। पटना में गंगा के फ्लड प्लेन पर बने सभी अनधिकृत निर्माण और अतिक्रमण हटाने के मामले में शीर्ष अदालत ने बिहार सरकार को आखिरी मौका देते हुए सख्त चेतावनी दी है कि अब इसके बाद कोई और रियायत नहीं मिलेगी।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने बिहार सरकार को अपने पहले दिए गए आदेश का पालन करने के लिए आठ सप्ताह का अंतिम समय दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस अवधि के बाद अगली सुनवाई में राज्य सरकार को अतिक्रमण हटाने की पूरी कार्रवाई की अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी होगी, और अगर ऐसा नहीं हुआ तो बिहार के मुख्य सचिव समेत अन्य अधिकारियों को सीधे अदालत में तलब कर अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है।

बाढ़ के चलते अटक गई थी कार्रवाई

अदालत ने याद दिलाया कि इससे पहले 21 जुलाई को उसने बिहार सरकार को नौजर घाट से नूरपुर घाट के बीच गंगा के फ्लड प्लेन में मौजूद हर अनधिकृत निर्माण हटाने के लिए छह सप्ताह का समय दिया था। बिहार के एडवोकेट जनरल एसडी संजय ने अदालत को बताया कि आदेश का आंशिक रूप से पालन हो चुका है, लेकिन नेपाल में हाल ही में आई प्राकृतिक आपदा की वजह से गंगा का जलस्तर अचानक बढ़ गया, जिससे पूरा इलाका पानी में डूब गया। इसी कारण अधिकारियों के लिए अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया।

“इसके बाद नहीं मिलेगा कोई समय”

इस स्पष्टीकरण पर गौर करते हुए भी कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया और कहा कि वह अपने निर्देशों के पालन के लिए आखिरी बार आठ सप्ताह का समय दे रही है। अदालत ने साफ चेतावनी दी कि अगर इस बार भी आदेश का पालन नहीं हुआ, तो बिहार के मुख्य सचिव और अन्य संबंधित अधिकारियों को सीधे अदालत के सामने पेश होना पड़ेगा, और आगे सख्त कार्रवाई भी हो सकती है।

किस मामले से जुड़ा है यह विवाद

दरअसल यह पूरा मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT के जून 2020 के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है, जिसमें NGT ने गंगा के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील फ्लड प्लेन में अवैध निर्माण और स्थायी अतिक्रमण के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया था।

जमीन के दस्तावेज दिखाना होगा अनिवार्य

अपने 28 सितंबर के आदेश में अदालत ने कुछ हस्तक्षेप कर्ताओं की उस दलील का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि उनके निर्माण अपनी निजी जमीन पर बने हैं और वह जमीन फ्लड प्लेन के दायरे में नहीं आती। अदालत ने ऐसे लोगों को सक्षम प्राधिकारी के सामने अपनी बात रखने की छूट दी है, लेकिन साथ ही कड़ी शर्त भी रखी है कि उन्हें जमीन के मालिकाना हक, निर्माण की स्वीकृति और भवन निर्माण की अनुमति से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज पेश करने होंगे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन दस्तावेजों के बिना किसी के भी पक्ष पर विचार नहीं किया जाएगा।

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