नई दिल्ली: गणेश चतुर्थी आते ही देशभर में गणपति के स्वागत की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, लेकिन बप्पा का स्वरूप हर जगह एक जैसा नहीं है. कहीं उन्हें ब्रह्मचारी माना जाता है, कहीं रिद्धि-सिद्धि के पति और कहीं शक्ति से जुड़े अलग रूप में पूजा जाता है. यही विविधता गणेश उपासना को खास बनाती है.
गणेशजी को कहीं सिद्धिविनायक, कहीं विघ्नहर्ता, कहीं बाल गणपति तो कहीं महागणपति के रूप में पूजा जाता है. उनके पारिवारिक स्वरूप को लेकर भी क्षेत्रीय मान्यताएं अलग हैं. कहीं वे अविवाहित और ब्रह्मचारी हैं, तो कहीं सिद्धि-बुद्धि या रिद्धि-सिद्धि के पति माने जाते हैं. तांत्रिक परंपराओं में उनका स्वरूप और भी अलग दिखाई देता है.
अलग क्षेत्रों और संप्रदायों में गणपति की उपासना के साथ स्थानीय कथाएं और मान्यताएं भी विकसित हुईं. यही वजह है कि एक ही देवता के बारे में अलग जगहों पर अलग धारणाएं सुनने को मिलती हैं.
दक्षिण भारत में ब्रह्मचारी गणपति
दक्षिण भारत की कई धार्मिक परंपराओं में गणपति को अविवाहित और ब्रह्मचारी माना जाता है. यहां उनका यह रूप संयम, ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ा जाता है. एक लोककथा के अनुसार गणेश अपनी माता पार्वती को आदर्श मानते थे और उनके समान गुणों वाली स्त्री से ही विवाह करना चाहते थे. ऐसी स्त्री न मिलने पर उन्होंने विवाह नहीं किया.
एक दूसरी कथा में कहा जाता है कि गणेश ने संसार की सभी स्त्रियों को आदिशक्ति और माता पार्वती का अंश माना. इसलिए उन्होंने विवाह न करने का निर्णय लिया. इसी से जुड़ी मान्यता में आदिशक्ति के स्त्री रूप को विनायकी देवी कहा गया. तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के सुचिंद्रम स्थित श्रीसुचिंद्रम थानुमलयन स्वामी मंदिर में इस स्त्री रूप की प्राचीन प्रतिमा होने की बात कही जाती है. इसे देवी गणेशिन भी कहा जाता है. दक्षिण भारत की अनेक परंपराओं में गणपति को गृहस्थ देवता के बजाय ब्रह्मचारी रूप में पूजा जाता रहा है.
उत्तर भारत में रिद्धि-सिद्धि के पति
उत्तर भारत में पहुंचते ही गणपति की पारिवारिक छवि काफी अलग नजर आती है. यहां ‘रिद्धि-सिद्धि दाता गणेश’ की मान्यता लोकप्रिय है. कई चित्रों और प्रतिमाओं में उनके साथ दो स्त्री आकृतियां दिखती हैं. शिव पुराण की एक कथा में प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि का विवाह गणेश से बताया गया है. इसी कथा में सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ नामक पुत्रों का उल्लेख मिलता है. बाद की लोकप्रिय परंपराओं में यही धारणा रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ के नाम से प्रसिद्ध हुई. बुद्धि विवेक और ज्ञान, सिद्धि सफलता और रिद्धि समृद्धि का संकेत देती है. इसलिए इन्हें गणेश के गुणों और शक्तियों के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है.
बंगाल में ‘कोला बऊ’ की परंपरा
बंगाल की दुर्गा पूजा में गणेश प्रतिमा के पास साड़ी में लिपटा केले का पौधा दिखता है, जिसे ‘कोला बऊ’ या ‘कला बऊ’ कहा जाता है. लोकधारणा में इसे गणेश की पत्नी माना जाता है. लेकिन धार्मिक रूप से कोला बऊ की भूमिका अलग है. वह नवपत्रिका पूजा का हिस्सा है, जिसमें नौ प्रकार की वनस्पतियों को एक साथ बांधकर देवी शक्ति के रूप में पूजा जाता है. दुर्गा पूजा के मंडप में गणेश के पास इसकी स्थापना होने से समय के साथ इसे उनकी पत्नी मानने की लोकमान्यता मजबूत हुई. इससे पता चलता है कि धार्मिक प्रतीकों के अर्थ शास्त्रीय और लोक परंपरा में अलग हो सकते हैं.
तांत्रिक परंपरा में शक्ति के साथ गणपति
गणपति उपासना का एक अलग पक्ष तांत्रिक परंपराओं में मिलता है. शाक्त और तांत्रिक प्रभाव वाली परंपराओं में उच्छिष्ट गणपति, महागणपति, ऊर्ध्व गणपति, पिंगल गणपति और लक्ष्मी गणपति जैसे कई रूपों का उल्लेख मिलता है. कुछ प्रतिमाओं में गणपति अपनी शक्ति के साथ दिखाई देते हैं. इसे सामान्य वैवाहिक संबंध की तस्वीर समझना उचित नहीं है. तांत्रिक दर्शन में शक्ति देवता की सक्रिय ऊर्जा और सृजन की क्षमता का प्रतीक होती है.
गणपति को सर्वोच्च देवता मानने वाली गाणपत्य परंपरा भी करीब 10वीं शताब्दी तक प्रभावशाली हो चुकी थी. इसमें गणपति को शिव-पार्वती के पुत्र के साथ परम सत्ता के रूप में भी माना गया. इन मान्यताओं को भारतीय धार्मिक परंपराओं के विकास के रूप में देखना अधिक सही है. दक्षिण में गणपति ब्रह्मचारी हैं, उत्तर भारत में रिद्धि-सिद्धि के स्वामी और शुभ-लाभ से जुड़े गृहस्थ देवता हैं, जबकि बंगाल में वे दुर्गा पूजा की व्यापक शक्ति परंपरा का हिस्सा बनते हैं.
फिर भी इन सभी रूपों के पीछे गणपति का मूल भाव एक ही रहता है. वे बुद्धि, विवेक, शुभता और विघ्नों को दूर करने वाली शक्ति के देवता हैं. यही वजह है कि अलग-अलग मान्यताओं के बावजूद किसी भी शुभ काम से पहले गणेशजी का स्मरण करने की परंपरा पूरे देश में मजबूत है.












