2047 तक भारत की बंदरगाह क्षमता चार गुना करने का लक्ष्य, पीयूष गोयल ने रॉटरडैम के साथ सहयोग का रोडमैप बताया

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भारत की अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विस्तार के साथ बंदरगाहों पर माल ढुलाई का दबाव भी बढ़ने की संभावना है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि भारत वर्ष 2047 तक अपनी बंदरगाह क्षमता को मौजूदा स्तर से चार गुना करने की दिशा में काम करना चाहता है। नीदरलैंड की यात्रा के दौरान रॉटरडैम में उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में भारत की बंदरगाह क्षमता दोगुनी हुई है, लेकिन भविष्य की आर्थिक जरूरतों को देखते हुए इसे और बढ़ाना जरूरी है। उनका कहना है कि देश की आर्थिक वृद्धि और वैश्विक व्यापार को समर्थन देने के लिए आधुनिक समुद्री बुनियादी ढांचे में निवेश करना होगा। बंदरगाहों की क्षमता बढ़ने से अधिक माल संभालने, परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक भारतीय उत्पादों की पहुंच मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

रॉटरडैम के अनुभव से भारत को मिल सकता है लाभ

पीयूष गोयल ने यूरोप के प्रमुख समुद्री व्यापार केंद्रों में शामिल पोर्ट ऑफ रॉटरडैम के साथ सहयोग की संभावनाओं पर विशेष जोर दिया। रॉटरडैम यूरोपीय बाजारों तक सामान पहुंचाने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है। यहां विकसित बंदरगाह व्यवस्था, माल प्रबंधन और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अहम भूमिका निभाते हैं। गोयल के मुताबिक, भारत अपने बंदरगाहों का आधुनिकीकरण करते हुए रॉटरडैम के अनुभव से सीख सकता है। सहयोग का उद्देश्य केवल बंदरगाहों का आकार बढ़ाना नहीं, बल्कि उनकी परिचालन दक्षता में सुधार करना भी है।

यदि माल की आवाजाही, जहाजों के ठहराव और कस्टम प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जाता है, तो कारोबारियों के लिए समय और लागत बचाने के अवसर पैदा हो सकते हैं। भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक संपर्क मजबूत होने से निर्यातकों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है।

ग्रीन एनर्जी और कार्बन कैप्चर पर जोर

समुद्री क्षेत्र के विकास में पर्यावरणीय जिम्मेदारी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। गोयल ने ग्रीन एनर्जी और कार्बन कैप्चर जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं का उल्लेख किया। ग्रीन एनर्जी का इस्तेमाल बढ़ाने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने वाली तकनीकों को अपनाने से बंदरगाहों के संचालन को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है। कार्बन कैप्चर तकनीक का उद्देश्य औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़ना और उसके उत्सर्जन को नियंत्रित करने में मदद करना है।

इन क्षेत्रों में नई तकनीकों, निवेश और विशेषज्ञता के आदान-प्रदान से भारत को लाभ मिल सकता है। साथ ही, स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े उत्पादों और सेवाओं के अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी नए अवसर खुल सकते हैं। ऐसे प्रयासों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि समुद्री परिवहन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख हिस्सा है।

‘ये दिल मांगे मोर’ के साथ सागरमाला पर भरोसा

गोयल ने अपने संबोधन में ‘ये दिल मांगे मोर’ का नारा देते हुए कहा कि भारत को अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट होकर रुकना नहीं चाहिए। उनके अनुसार, देश को गुणवत्ता, उत्पादकता और परिचालन दक्षता के मानकों को लगातार ऊंचा करना होगा। उन्होंने केंद्र सरकार की सागरमाला पहल का भी उल्लेख किया, जिसका उद्देश्य बंदरगाहों के बुनियादी ढांचे और समुद्री कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना है। बंदरगाहों को सड़क, रेल और अन्य परिवहन नेटवर्क से प्रभावी तरीके से जोड़ना माल ढुलाई की लागत घटाने और कारोबार की गति बढ़ाने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

समुद्री बुनियादी ढांचे में सुधार से तटीय क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिल सकता है। हालांकि, 2047 का लक्ष्य हासिल करने के लिए निवेश, परियोजनाओं का समय पर पूरा होना और आधुनिक तकनीकों को अपनाना अहम रहेगा।

मुंबई में समुद्री प्रशिक्षण संस्थान की योजना

मंत्री ने मुंबई में एक बड़े समुद्री शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की योजना का भी जिक्र किया। इसका उद्देश्य ऐसे कुशल नाविक और पेशेवर तैयार करना है, जो भारत के साथ-साथ वैश्विक शिपिंग उद्योग की जरूरतों को पूरा कर सकें। समुद्री व्यापार का विस्तार केवल बंदरगाहों और मशीनों पर निर्भर नहीं करता; इसके लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन भी जरूरी है। जहाज संचालन, सुरक्षा, तकनीकी रखरखाव और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में योग्य कर्मचारियों की उपलब्धता उद्योग की क्षमता बढ़ा सकती है। इस तरह बंदरगाह विस्तार और कौशल विकास को एक साथ आगे बढ़ाने की योजना बनाई जा रही है।

भारत के वैश्विक व्यापार के लिए क्या मायने हैं?

भारत की बंदरगाह क्षमता बढ़ाने की योजना का व्यापक उद्देश्य देश को वैश्विक व्यापार और लॉजिस्टिक्स में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। बेहतर बंदरगाह सुविधाएं निर्यातकों को सामान तेजी से भेजने, आयात प्रक्रिया को प्रभावी बनाने और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाएं कम करने में मदद कर सकती हैं। रॉटरडैम जैसे अंतरराष्ट्रीय केंद्रों के साथ सहयोग से भारत को तकनीकी विशेषज्ञता और संचालन संबंधी अनुभव हासिल करने का अवसर मिल सकता है।

हालांकि, चार गुना क्षमता का लक्ष्य अपने आप में एक महत्वाकांक्षी दिशा है; इसका वास्तविक असर परियोजनाओं के क्रियान्वयन, वित्तपोषण, पर्यावरणीय मानकों और परिवहन नेटवर्क के समन्वय पर निर्भर करेगा। यदि ये प्रयास प्रभावी तरीके से आगे बढ़ते हैं, तो भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को दीर्घकालिक मजबूती मिल सकती है।

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